अमीरे मुआविया और करबला 12

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                       12/01/1442

    *हिन्दी* *हिस्सा-12*


*अमीर मुआविया और करबला*

*फुक़्हा* - मौला अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की शहादत के बाद 40000 कूफियों ने हज़रत इमाम हसन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की बैयत की और आपको खलीफतुल मुसलेमीन माना,इस मनसब पर आप 6 महीने फायज़ रहे फिर हज़रते अमीर मुआविया रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के आपके पास कूफा आने पर आपने 3 शर्तों के साथ उनको खिलाफत सुपुर्द कर दी

1. फिलहाल हज़रते अमीरे मुआविया रज़ियल्लाहु तआला अन्हु खलीफा होते हैं मगर उनके इन्तेक़ाल के बाद हज़रत इमाम हसन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु ही खलीफा होंगे

2. ईराक़,हिजाज़ व मदीना तय्यबा वग़ैरह के लोगों से हज़रत अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के ज़माने के मुताअल्लिक़ कोई मुतालेबा नहीं किया जायेगा

3. हज़रत इमाम हसन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के ज़िम्मे जो भी क़र्ज़ हैं उनकी अदायगी हज़रत अमीर मुआविया रज़ियल्लाहु तआला अन्हु करेंगे

*फुक़्हा* - ये तीनो शर्तें मानी गई और नबी करीम सल्लललाहु तआला अलैहि वसल्लम का वो क़ौल सादिक़ हुआ कि मेरा ये बेटा मुसलमान की दो जमाअतों के बीच सुलह करायेगा,ये वाक़िया 41 हिजरी में हुआ मगर इसके कुछ साल बाद 45 साल 6 महीने और चंद दिन की उम्र में ही 5 रबीउल अव्वल 49 हिजरी में आपका विसाल हो गया,उनकी शहादत का वाक़िया इन शा अल्लाह फिर कभी बयान करूंगा,माहे रजब 60 हिजरी में हज़रत अमीर मुआविया रज़ियल्लाहु तआला अन्हु का भी इन्तेक़ाल हो गया मगर इन्तेक़ाल से पहले उन्होंने यज़ीद को अपना जांनशीन मुन्तखिब कर दिया था,मगर कुछ नसीहतों के साथ,मुलाहज़ा करें "जब हज़रते अमीर मुआविया रज़ियल्लाहु तआला अन्हु का विसाल का वक़्त आया तो यज़ीद उनके पास पहुंचा और पूछा कि अब्बा जान आपके बाद खलीफा कौन होगा तो आपने फरमाया कि खलीफा तो तू ही बनेगा मगर मैं जो कुछ कहता हूं उसे ग़ौर से सुन,कोई काम हज़रत इमाम हुसैन के मश्वरे के बग़ैर मत करना,उन्हें खिलाये बग़ैर ना खाना,उन्हें पिलाये बग़ैर ना पीना,सबसे पहले उन पर खर्च करना फिर किसी और पर,पहले उन्हें पहनाना फिर खुद पहनना,मैं तुझे हज़रत हुसैन उनके घर वालों और उनके कुनबे बल्कि सारे बनी हाशिम के लिए अच्छे सुलूक की वसीयत करता हूं,ऐ बेटे खिलाफत हमारा हक़ नहीं है वो इमाम हुसैन उनके वालिद हज़रत अली व उनकी अहले बैत का हक़ है,तुम चंद रोज़ खलीफा रहना फिर जब हज़रत इमाम हुसैन पूरे कमाल को पहुंच जायें तो फिर वही खलीफा होंगे या जिसे वो चाहें ताकि खिलाफत अपनी जगह पहुंच जाये,हम सब हुसैन व उनके नाना के ग़ुलाम हैं उन्हें नाराज़ ना करना वरना तुझ पर अल्लाह व रसूल नाराज़ होंगे" 

📕 अमीरे मुआविया पर एक नज़र,सफह 94

*फुक़्हा* - मगर फिर भी कुछ लोग हज़रते अमीर मुआविया रज़ियल्लाहु तआला अन्हु पर ऐतराज़ करते हैं जो कई कई सफहात पर फैला हुआ है और बहुत मुश्किल है कि यहां लिखा जाये,लिहाज़ा उन सबकी तफसीली मअलूमात के लिए किताब खुतबाते मुहर्रम या सवानेह कर्बला का मुताआला किया जाये,फिलहाल एक ऐतराज़ यहां दर्ज करता हूं और यही सबसे अहम समझा जाता है कि हज़रते अमीर मुआविया ने अपनी ज़िन्दगी में ही यज़ीद को अपना जांनशीन मुन्तखिब कर दिया था इसमें उन्होंने 3 गलतियां की

1. खलीफा का इन्तेखाब आम लोगों की राय से होना चाहिये था उन्होंने खुद क्यों चुना

2. अपने बेटे को जांनशीन बनाना कानूने इस्लाम के खिलाफ है

3. यज़ीद जो कि फासिको फाजिर था जिस शख्स को इमाम नहीं बनाया जा सकता वो शख्स खलीफतुल मुसलेमीन कैसे बनाया गया

*ⓩ ये वो ऐतराज़ हैं जो हज़रते अमीरे मुआविया रज़ियल्लाहु तआला अन्हु पर आयद है अब इनका जवाब भी पढ़ लीजिये*

1. खलीफा अपनी ज़िन्दगी में दूसरे को खलीफा बना सकता है जैसा कि अबु बकर सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु तआला अन्हु ने अपनी ज़िन्दगी में ही हज़रते उमर फारूके आज़म रज़ियल्लाहु तआला अन्हु को अपना जांनशीन बना दिया था

2. अपने बेटे को जांनशीन बनाना क़ुर्आनो हदीस से मना नहीं है

3. अब रहा यज़ीद का फिस्को फुजूर तो याद रहे कि हज़रते अमीरे मुआविया रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की ज़िन्दगी में उसके फासिक़ होने का कोई सुबूत नहीं है,और अगर कोई पेश करता है तो वो झूठा है कज़्ज़ाब है,क्योंकि सहाबी का आदिल परहेज़गार मुत्तक़ी होना जमहूर के नज़दीक मुसल्लम है,यज़ीद का मुआमला ऐसा ही है जैसा कि इब्लीस लईन का था कि पहले वो भी मुअल्लिमुल मलाकूत हुआ करता था मगर जब उसका कुफ्र ज़ाहिर हुआ तो लाअनती हो गया उसी तरह यज़ीद भी हज़रते अमीर मुआविया रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की ज़िन्दगी तक अपने आपको रोके रहा और फिस्को फुजूर उनकी मौत के बाद ज़ाहिर किया लिहाज़ा ये ऐतराज़ ही बातिल है,अब ये कहना कि कर्बला के वाक़िये की सारी ज़िम्मेदारी हज़रते मुआविया रज़ियल्लाहु तआला अन्हु पर है कि अगर वो यज़ीद को खलीफा ना बनाते तो वो खूनी मंज़र ना होता ये सरासर गलत है,इस तरह देखा जाये तो ये ऐतराज़ कहां से कहां पहुंच जायेगा,देखिये

! सबसे पहले तो ये ऐतराज़ हज़रत इमाम हसन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु पर आयद हो जायेगा कि क्यों उन्होंने हज़रते अमीर मुआविया को खलीफा तस्लीम किया और क्यों उनके लिए गद्दी खाली की,क्योंकि उस वक़्त तो हज़रत इमाम हसन रज़ियल्लाहु तआला के नाम पर जान देने के लिए 40000 का लश्कर तैयार खड़ा था अगर जंग करते तो शायद हज़रते अमीर मुआविया रज़ियल्लाहु तआला अन्हु का किस्सा ही खत्म हो जाता,ना वो खलीफा बनते ना अपने बेटे को बनाते,लिहाज़ा मोअतरिज़ के हिसाब से सारी ज़िम्मेदारी हज़रते इमाम हसन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की है

! दूसरे जब हुज़ूर के चचा हज़रते अब्बास रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के यहां लड़का हुआ तो आप उसे लेकर हुज़ूर की बारगाह में गये तो हुज़ूर ने उसका नाम अब्दुल्लाह रखा और फरमाया कि ये खुल्फाओं का बाप है,मतलब ये कि हुज़ूर ने देख लिया कि कौन कौन पैदा होने वाला है तो यक़ीनन हज़रते अमीरे मुआविया रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की औलाद यज़ीद को भी जाना होगा,तो क्यों नहीं हज़रते अमीरे मुआविया को वसीयत की कि तुम हरगिज़ यज़ीद को खलीफा ना बनाना तो सारी बात जानते हुये भी अगर हुज़ूर ने मना नहीं किया तो मोअतरिज़ के हिसाब से सारी ज़िम्मेदारी हुज़ूर की है

! तीसरा ये कि फिर कोई बदबख्त ये भी कह सकता है कि खुदा ने यज़ीद को पैदा ही क्यों किया और पैदा किया भी तो हज़रते अमीरे मुआविया की ज़िन्दगी में ही उसे मौत क्यों ना दे दी,तो मोअतरिज़ के हिसाब से अब सारी ज़िम्मेदारी ख़ुदा की रही

*ⓩ मआज़ अल्लाह,मआज़ अल्लाह,सुम्मा मआज़ अल्लाह,याद रहे कि ये बहस यज़ीद को सही साबित करने की नहीं बल्कि हज़रते अमीरे मुआविया रज़ियल्लाहु तआला अन्हु पर से ऐतराज़ को दफअ करने की है,कौन अमीर मुआविया,वो* 

! जिनकी बहन हज़रत सय्यदतना उम्मे हबीबा रज़ियल्लाहु तआला अन्हा हुज़ूर की ज़ौजियत में दाखिल हुईं

! जिनके लिए खुद हुज़ूर ने हिदायत याफ्ता और हिदायत देने वाला होने की दुआ फरमाई 

! आपसे 163 हदीसें मरवी हैं जो कि बुखारी मुस्लिम तिर्मिज़ी अबू दाऊद निसाई बैहकी तबरानी वगैरह में मौजूद है और बड़े बड़े सहाबये किराम ने जिनसे हदीसें रिवायत की

! जिनके बारे में अब्दुल्लाह बिन मुबारक जैसे जलीलुल क़द्र इमाम ये कहते हैं कि हज़रत उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ यानि खिलाफते राशिदह के पांचवे इमाम जिनको इमामुल हुदा भी कहा जाता है,जिनकी ज़ियारत को खुद हज़रत ख़िज़्र अलैहिस्सलाम हाज़िर हुआ करते थे मगर मर्तबे में हज़रते अमीरे मुआविया रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के घोड़े की नाक में जो गर्दो गुबार रहता है उसके बराबर भी उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ नहीं,अल्लाहु अकबर,फिर हज़रते अमीरे मुआविया रज़ियल्लाहु तआला अन्हु का मर्तबा कैसा होगा

! हज़रते अल्लामा शहाबउद्दीन खफ्फाजी नसीमुर रियाज़ में फरमाते हैं जो कोई अमीरे मुआविया पर लअन तअन करे वो जहन्नम के कुत्तो में से एक कुत्ता है

! जिन्हें रईसुल मुफस्सेरीन हज़रत अब्बास रज़ियल्लाहु तआला अन्हु खुद मुजतहिद जाने

! जिन्हें हज़रते उमर रज़ियल्लाहु तआला अन्हु ने दमिश्क का हाकिम बनाया और आपकी आखिर उम्र तक मअज़ूल ना फरमाया,जबकि ज़रा सी जग्ज़िश से ही आप किसी को भी मनसब से हटा दिया करते थे जैसा कि खालिद बिन वलीद रज़ियल्लाहु तआला अन्हु जैसी ज़ात को भी अपना मअज़ूल फरमा दिया था

! आप हमेशा अहले बैत पर दिल खोलकर खर्च फरमाते थे,एक मर्तबा 4 लाख दिरहम आपने हज़रते इमाम हसन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु को पेश फरमाया जिसे हज़रते हसन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु ने क़ुबूल फरमाया

! आपसे कई करामतें ज़ाहिर हुईं आपकी एक खुली हुई करामत ये भी है कि जब मदीना शरीफ में हज़रते उसमान ग़नी रज़ियल्लाहु तआला अन्हु को लोगों ने शहीद कर दिया तो आप फरमाते हैं "अब मदीना में कभी खिलाफत ना होगी" लिहाज़ा आज तक कभी किसी खलीफा ने मदीना मुनव्वरा को दारुल खिलाफत ना बनाया

*ⓩ अब अगर ऐसी ज़ात पर यज़ीद जैसे फासिक़ फाजिर शराबी ज़ानी झूठा अय्याश व बदकार की वजह से सिर्फ इसलिए तोहमत लगाई जाये कि वो यज़ीद के बाप थे तो ये सिवाये जाहिलियत के और क्या है,ईमान और कुफ्र में नस्ब नहीं देखा जाता अगर ऐसा ही है तो ना जाने कितने वली और बुज़ुर्ग ऐसे गुज़रे हैं जिनके बाप-दादा ईमान से दूर रहे और दूर क्यों जाते हैं खुद मौला अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के वालिद अबू तालिब ने ईमान नहीं क़ुबूल किया तो क्या उनके कुफ्र से मौला अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की महबूबियत में कुछ फर्क़ आ गया,नहीं और हरगिज़ नहीं,तो करबला मुअल्ला में जो कुछ हुआ उसमें सिर्फ और सिर्फ यज़ीद का हाथ था और उसके हुक्म पर अहले बैते अतहार को सताया गया और इमामे हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु को शहीद किया गया,इस बात के लिए जितनी मज़म्मत करनी हो यज़ीद के हक़ में करें,और खुदारा सहाबये किराम की शान में बकवास करने से अपनी ज़बान को रोकें वरना अपनी ही आखिरत खराब कर बैठेंगे*

📕 खुतबाते मुहर्रम,सफह 331-364

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