शहीद की पूरीतफससील 03
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*ZEBNEWS*
03/01/1441
*हिन्दी* *हिस्सा-3*
*मुहर्रमुल हराम*
*पोस्टमॉर्टम*
आज की पोस्ट शहीद की पूरी तफसील पर मैं तैयार कर चुका था मगर कल से एक msg बहुत से लोगों ने भेज दिया है और सब ही उसका जवाब चाहते हैं,msg ताज़ियादारी के जायज़ होने के तअल्लुक़ से है जिसमें बहुत सारी खुराफात और बहुत सारे वलियों का नाम लेकर ये बताया गया है कि उन सबने ताज़ियादारी की है माज़ अल्लाह,इसका जवाब तो मैं ताज़ियादारी की पोस्ट में दे चुका हूं वहीं से पढ़ लीजिये पर उस msg में एक बहुत ही हैरत अंगेज़ बात ये लिखी हुई है उसको युंही पेस्ट करता हूं,लिखा है कि
*मुस्लमान होना ज़रूरी नहीं है साहब आशिक़ ए हुसैन होना जरूरी है!!!!!*
माज़ अल्लाह सुम्मा माज़ अल्लाह,ये शख्स ताज़ियादारी को जायज़ करने के चक्कर में कहां पहुंच गया है समझाता हूं,साहिबे बहारे शरीयत हुज़ूर सदरुश्शरिया हज़रत अल्लामा मौलाना अमजद अली आज़मी रहमतुल्लाह तआला अलैहि फरमाते हैं कि
*ईमान और कुफ्र में कोई वास्ता नहीं मतलब ये कि या तो आदमी मुसलमान होगा या काफिर बीच की कोई दूसरी राह नहीं*
📕 बहारे शरीयत,हिस्सा 1,सफह 54
इसका साफ सुथरा मतलब ये है कि जो मुसलमान है तो वो मुसलमान है और जो मुसलमान नहीं वो काफिर है और काफिर के लिए हमेशा की जहन्नम,तो अब जिसने ये कहा कि मुसलमान होना ज़रूरी नहीं तो ज़ाहिर है कि उसने कुफ्र को पसंद किया और जिसने कुफ्र को पसंद किया वो ऐसे भी काफिर हुआ जैसा कि आलाहज़रत अज़ीमुल बरक़त फरमाते हैं कि
*जिसने किसी बातिल फिरके को पसंद किया वो काफिर है*
📕 अहकामे शरीयत,हिस्सा 2,सफह 163
आपको मिसाल देकर समझाता हूं कि दुनिया में बहुत सारे ऐसे गैर मुस्लिम स्कॉलर हुए हैं जिन्होंने इस्लाम की शान में और हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम की शान में बहुत सी तारीफें की मगर वो अपने मज़हब से हटे नहीं बल्कि उसी पर कायम रहे तो क्या आप उन्हें मुसलमान कहेंगे नहीं और हरगिज़ नहीं,उसी तरह आपने अक्सर देखा सुना होगा कि मज़ारों पर मस्जिदों के बाहर मुस्लिम आमिलों के पास बहुत सारे गैर मुस्लिम नज़र आते हैं उनमें से बहुत सारे ऐसे लोग होते हैं जो इस्लाम के खिलाफ नहीं बोलते बल्कि तारीफ ही करते हैं तो क्या मज़ारो पर आने वाले किसी भी आदमी को आप मुसलमान मानेंगे नहीं और हरगिज़ नहीं,ये सब छोड़िये आपको 1400 साल पहले ले चलता हूं हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम को अरब के काफिर भी अमीन यानि सच्चा कहा करते थे अब ज़रा ये बताइए कि एक आदमी किसी को सच्चा किस बुनियाद पर कहेगा ज़ाहिर सी बात है उसकी अच्छाईओं को देखकर और उससे मुहब्बत की बुनियाद पर कहेगा वरना आप किसी को गाली देते हों किसी को पसंद ना करते हों किसी की हंसी उड़ाते हों तो क्या आप उसको अच्छा कहेंगे,नहीं बिलकुल नहीं बल्कि आप अच्छा उसी को कहेंगे जिससे आप मुहब्बत रखते होंगे,मगर वहां देखिये कि काफिरो का आपको अमीन कहने के बावजूद आपने उन सबको कल्मे की दावत पेश की कि मुसलमान हो जाओ तो निजात है वरना हमेशा की आग में रहना होगा फिर जिसने कल्मा पढ़ लिया मुसलमान हो गया और जिसने नहीं वो काफिर हुआ,अरे इसको भी छोड़िये अबू तालिब को देखिये जो आपके चाचा और मौला अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के बाप थे हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम से इतनी मुहब्बत करने के बावजूद भी कल्मा नहीं पढ़ा तो अल्लाह ने उन्हें मुसलमान नहीं माना बल्कि दुआए मगफिरत करने तक के लिए हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम को मना फरमा दिया,क़ुर्आन में फरमाता है कि
*बेशक ऐ नबी ये नहीं कि तुम जिसे अपनी तरफ से चाहो हां अल्लाह हिदायत फरमाता है जिसे चाहे*
📕 पारा 20,सूरह अलक़सस,आयत 56
ये आयत अबू तालिब के हक़ में नाज़िल हुई और इसका शाने नुज़ूल ये है कि जब अबू तालिब की मौत का वक़्त आया तो हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम ने उनसे कहा कि आप मेरे कान में कल्मा पढ़ लीजिये ताकि मैं क़यामत के दिन आपकी गवाही दे सकूं कि आप मुसलमान हैं इस पर भी उन्होंने इनकार किया तो आप ग़मगीन हो गए तो ये आयत उतरी जिसमे मौला फरमाता है कि ऐ महबूब ग़म ना करो कि तुमने अपना मंसबे हक़ यानि तब्लीग अदा कर दी अब किसको ईमान की दौलत देना है और किसको नहीं ये हमारा काम है
📕 मुस्लिम,जिल्द 1,सफह 40
📕 तिर्मिज़ी,जिल्द 2,सफह 150
📕 मअलेमुत तंज़ील,जिल्द 3,सफह 387
📕 तफसीरे जलालैन,सफह 332
📕 तफसीरे नस्फी,जिल्द 3,सफह 240
📕 तफसीरे कबीर,जिल्द 25,सफह 2
📕 तफसीरुल किशाफ,जिल्द 3,सफह 443
📕 मिरकात,जिल्द 9,सफह 640
*नबी और मोमिनो को लायक़ नहीं कि मुशरिकों की बख्शिश चाहें अगर चे वो उनके रिश्तेदार हों जबकि उन्हें खुल चुका कि वो दोज़खी हैं*
📕 पारा 11,सूरह तौबा,आयत 113
ये आयत भी अबू तालिब के हक़ में नाज़िल हुई जबकि हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम ने आपके लिए दुआये मगफिरत करना चाहा तो मौला ने आपको मना फरमा दिया
📕 बुखारी,जिल्द 1,सफह 181/548
📕 तफसीरे नस्फी,जिल्द 2,सफह 128
📕 तफसीरे बैदावी,जिल्द 4,सफह 648
📕 तफसीरे जलालैन,सफह 167
📕 उम्दतुल क़ारी,जिल्द 8,सफह 262
📕 निसाई,जिल्द 1,सफह 286
📕 अलइतकान,जिल्द 1,सफह 73
📕 ज़रक़ानी,जिल्द 1,सफह 293
और भी आयत पेश की जा सकती है मगर समझाने के लिए इतना काफी है सोचिये कि जिस चचा ने हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम को 8 साल की उम्र से पाला पोसा बड़ा किया उनकी शादी कराई उनके हर काम में साथ रहे मगर जब उन्होंने कल्मा नहीं पढ़ा तो मौला उनको काफिर कहने से परहेज़ नहीं कर रहा है अब बताईये कि जिनसे मुहब्बत करना मदारे ईमान है उनसे मुहब्बत की जाए मगर कल्मा ना पढ़े तो काफिर और आज का ये जाहिल कहता है कि मुसलमान होना ज़रूरी नहीं बल्कि सिर्फ इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु से मुहब्बत रखना ही काफी है तो ये कहकर वो मरदूद खुद तो काफिर होकर जहन्नमी हुआ और जो उसकी बात की जो तस्दीक़ करेगा वो भी काफिर होगा,किसी से भी मुहब्बत उसी वक़्त काम आयेगी जबकि ईमान वाला हो यानि मुसलमान हो वरना क्या राफज़ी यानि शिया कम अहले बैत से मुहब्बत का दावा करते हैं मगर उनके बारे में क्या हुक्म है आंख खोल कर पढ़िए
*राफज़ियों को काफिर कहना ज़रूरी है ये फिर्का इस्लाम से खारिज है मुर्तदीन के हुक्म में है*
📕 फतावा आलमगीरी,जिल्द 3,बाब 9,सफह 264
मौला से दुआ है कि हमें ऐसे गुमराहों और उनकी गुमराहियों से महफूज़ रखे-आमीन
जारी रहेगा...........
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