शहादते इमामे हुसैन और राफजी 05
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*ZEBNEWS*
05/01/1441
*हिन्दी* *हिस्सा-5*
*मुहर्रमुल हराम*
*शहादते इमाम हुसैन और राफजी*
राफजी - गद्दार,गिरोह को छोड़ने वाला
शिया - मुहिब्ब,मददगार,चाहने वाला
राफजी जिनको उर्फे आम में शिया भी कहा जाता है हालांकि ये क़ौम हरगिज़ शिया कहलाने के लायक़ नहीं है,दोनों लफ्ज़ के मानों में ज़मीन आसमान का फर्क है और ये मुमकिन ही नहीं कि एक ही क़ौम के दो अलक़ाब हों और दोनों के माने एक दूसरे से इतने ज़्यादा जुदा हों,जिस तरह की ये क़ौम है और जैसा इनका अमल रहा है उस पर राफजी यानि गद्दार ही ठीक बैठता है,हदीसे पाक में आता है मौला अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं कि
*आखिर ज़माने में एक गिरोह पाया जाएगा जिनका एक खास लक़ब होगा उनको राफजी कहा जाएगा वो हमारी जमात में होने का दावा करेगा और दर हक़ीक़त वो हमारी जमात से नहीं होगा उनकी निशानी ये होगी कि वो हज़रत अबु बक्र रज़ियल्लाहु तआला अन्हु व हज़रत उमर रज़ियल्लाहु तआला अन्हु को बुरा कहेंगे*
📕 कंज़ुल उम्माल,जिल्द 6,सफह 81
और नवासये रसूल हज़रत ज़ैद शहीद रज़ियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं कि
*ऐ कूफियों खारजियों ने तो उन्हें गालियां दी जो मरतबे में अबु बक्र रज़ियल्लाहु तआला अन्हु व उमर रज़ियल्लाहु तआला अन्हु से कम थे यानि उसमान रज़ियल्लाहु तआला अन्हु व अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु को क्योंकि अबु बक्र व उमर की शान में कुछ कहने की गुंजाइश ना पाई,लेकिन ऐ कूफियों तुमने तो उनसे भी ऊपर छलांग लगाई और अबु बक्र व उमर को गालियां दी तो अब कौन रह गया खुदा की कसम अब कोई ना रह गया जिसको तुमने गालियां ना दी*
📕 गायतुत तहक़ीक़ फी इमामते अली व सिद्दीक़,सफह 15
ये काफिरो मुर्तद फिरका जिसके बहुत सारे कुफ्रिया अक़ायद हैं उन सबकी तफसील अलग से पोस्ट में आयेगी,उनके इन्ही कुफ्र के सबब आज से तक़रीबन कई 100 साल पहले 500 उल्माये किराम की मेहनत से सुल्तान औरंगज़ेब आलमगीर रहमतुल्लाह तआला अलैहि के ज़ेरे नज़र तरतीब पाई किताब फतावा आलमगीरी में है कि
*राफज़ियों को काफिर कहना ज़रूरी है ये फिर्का इस्लाम से खारिज है मुर्तदीन के हुक्म में है*
📕 फतावा आलमगीरी,जिल्द 3,बाब 9,सफह 264
ये निहायत ही ग़द्दार क़ौम है अब इनकी वो ग़द्दारी मुलाहज़ा करें जो इन्होने कर्बला के मैदान में दिखाई,पढ़िये
*कूफियों ने हज़रत अमीरे मुआविया रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के ज़माने में ही इमाम आली मक़ाम रज़ियल्लाहु तआला अन्हु को कूफा बुलाने के लिए कई खत लिख चुके थे मगर हज़रत अमीर मुआविया रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के इन्तेक़ाल के बाद इन खतों की तादाद बढ़ती गयी,जब आपने उनकी ये अक़ीदत मुलाहज़ा की तो आपने कूफा के हालात का जायज़ा लेने के लिए पहले अपने चचाज़ाद भाई हज़रते मुस्लिम बिन अक़ील रज़ियल्लाहु तआला अन्हु को कूफा भेजा,जब हज़रते मुस्लिम रज़ियल्लाहु तआला अन्हु कूफा पहुंचे तो सबने जोशो मुहब्बत के साथ उनका इस्तेक़बाल किया और उनके हाथों पर बैयत की,हज़रते मुस्लिम रज़ियल्लाहु तआला अन्हु ने जब देखा कि यहां हालात तो सब ठीक ठाक है तो आपने हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु को खत लिखा कि आप भी यहां तशरीफ ले आयें,इस वक़्त आपके साथ 40000 कूफी थे मगर ज्यों ही कूफा के गवर्नर उबैदुल्लाह बिन ज़ियाद ने एलाने आम करवाया कि अगर किसी ने भी हज़रते मुस्लिम की मदद की तो वो यज़ीद का मुखालिफ क़रार पायेगा और उसे भी सख्त सज़ा मिलेगी तो हालत ये हो गयी कि शाम होते होते मग़रिब की ऐन नमाज़ में 500 आदमी शामिल थे मगर जब हज़रत मुस्लिम रज़ियल्लाहु तआला अन्हु ने सलाम फेरा तो एक भी कूफी वहां मौजूद नहीं था,फिर तो उन गद्दारों की बुज़दिली और ना मर्दी यहां तक पहुंच गई कि सबके सब अपनी मौत के डर से अपने ही घरों में ताले डालकर घर में ही छिप गये और हज़रत इमाम मुसलिम को किसी ने भी पनाह नहीं दी,उधर जब हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु को इमाम मुस्लिम रज़ियल्लाहु तआला अन्हु का खत मिला तो आप मय अहलो अयाल के कूफा का सफर करने को तैयार हो गए,मगर अकाबिर सहाबये किराम जैसे हज़रत इब्ने अब्बास,हज़रत इब्ने उमर,हज़रत जाबिर,हज़रत अबू सईद और हज़रत अबु वाक़िद लैसी वग़ैरह को कूफियों के अहद का ऐतबार ना था और आपने हज़रते इमाम को रोकने की बहुत कोशिश की मगर नाकाम हुए और लश्कर कूफा को रवाना हो गया,इधर हज़रते मुस्लिम रज़ियल्लाहु तआला अन्हु को और उनके 2 बेटों हज़रते मुहम्मद व हज़रते इब्राहीम को यज़ीदियों ने शहीद कर दिया,जिसकी खबर हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु को रास्ते में ही हो गई मगर चुंकि आप कर्बला पहुंच गए थे सो वापसी ना की और खेमा नसब किया*
📕 खुतबाते मुहर्रम,सफह 396-408
यही कूफी आज जो राफजी और शिया कहलाते हैं इनके मातम नोहा और हुसैन हुसैन करने पर बहुत से मुसलमान धोखा खा जाते हैं कि ये तो शैदाईये हुसैन हैं मगर हक़ीक़त इसके उलट है,भले ही इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु को शहीद करने वाली तलवार इनकी ना रही हो मगर इन गद्दारों ने इमाम का साथ छोड़कर अपने आपको भी उस क़यामते सुग़रह में शामिल किया है और ये भी उतने ही बड़े मुजरिम हैं जितना कि यज़ीद और उसकी फौज बल्कि उससे ज़्यादा कि ना तो ये हराम खोर खत लिखकर इमाम को बुलाते और ना वो इन गद्दारो पर भरोसा करके आते,और रही बात मातम करने की तो ये मातम करना उनकी मर्ज़ी नही बल्कि सज़ा है जैसा कि रिवायत में है कि
*जब इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु का सर मुबारक नेज़े पर चढाकर कूफे मे घुमाया जा रहा था तो यही कूफी अपने आपको इस क़त्ले अज़ीम से जुदा रखने की गर्ज़ से रोना पीटना कर रहे थे तो इस पर शहज़ादिये फातिमा ज़ोहरा हज़रते ज़ैनब रज़ियल्लाहु तआला अन्हा ने उन कूफियों से फरमाया कि "तुम लोग क्यों रो रहे हो तुमही लोगों ने तो हमें खत लिख लिख कर यहां बुलवाया था और आखिर मे हमारा साथ छोड़ दिया और आज इस क़त्ल से अपनी बराअत ज़ाहिर कर रहे हो ये आले रसूल की बद्दुआ है कि क़यामत तक तुम युंहि रोते पिटते रहोगे*
📕 बारह तक़रीरें,सफह 79
जारी रहेगा...........
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