सुन्नी और शिया 06

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                       06/01/1441

    *हिन्दी* *हिस्सा-6*

                      *मुहर्रमुल हराम*

                      *सुन्नी और शिया*

जैसा कि आपने सुना ही होगा कि मेरे आक़ा सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाते हैं कि मेरी उम्मत में 73 फिरके होंगे उसमें से एक ही जन्नती होगा और 72 हमेशा जहन्नम में रहेंगे उन्ही जहन्नमी फिरकों में राफजी यानि शिया भी एक फिरका है,ये अपने आपको शैदाइये अहले बैत कहता है और उनके इसी या अली या हुसैन कहने पर हमारे बहुत से सुन्नी मुसलमान धोखा खा जाते हैं और उन्हें काफिर कहने से परहेज़ करते हैं मगर ये क़ौम अहले बैते अत्हार की मुहब्बत की आड़ लेकर ना जाने कितने ही कुफ्रिया अक़ायद रखती है,वैसे तो हुक्मे कुफ्र एक ही ज़रूरियाते दीन के इन्कार पर लग जाता है मगर इनके यहां तो कुफ्र की भरमार है,इनकी चंद कुफ्री इबारतें पेश करता हूं मुलाहज़ा फरमायें
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शिया अक़ायद - मुहम्मद सल्लललाहो अलैहि वसल्लम ने जिस खुदा की ज़ियारत की वो कुल 30 साल का था,माज़ अल्लाह 

📕 उसूले काफी,जिल्द 1,सफह 49

सुन्नी अक़ायद - बेशक खुदाए तआला जिस्म जिस्मानियत से पाक है 

📕 बहारे शरीयत,हिस्सा 1,सफह 3
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शिया अक़ायद - अल्लाह तआला कभी कभी झूठ भी बोलता है,माज़ अल्लाह 

📕 उसूले काफी,जिल्द 1,सफह 328

सुन्नी अक़ायद - और अल्लाह से ज़्यादा किसी की बात सच्ची नहीं 

📕 पारा 5,सूरह निसा,आयत 122 
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शिया अक़ायद - अल्लाह तआला गलती भी करता है,माज़ अल्लाह

📕 उसूले काफी,जिल्द 1,सफह 328

सुन्नी अक़ायद - बेशक अल्लाह तआला हर ऐब से पाक है 

📕 बहारे शरीयत,हिस्सा 1,सफह 4
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शिया अक़ायद - अल्लाह तआला ने हज़रत जिब्रील को पैग़ामे रिसालत देकर अली के पास भेजा था लेकिन वो गलती करके मुहम्मद सल्लललाहो अलैहि वसल्लम के पास चले गए,माज़ अल्लाह 

📕 अनवारुल नोमानिया,सफह 237
📕 तज़किरातुल अइम्मा,सफह 78

सुन्नी अक़ायद - और वो (फरिश्ते) कभी भी कुसूर (गलती) नहीं करते 

📕 पारा 7,सूरह इनआम,आयत 61
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शिया अक़ायद - हज़रत अली खुदा हैं,माज़ अल्लाह 

📕 तज़किरातुल अइम्मा,सफह 77 

सुन्नी अक़ायद - अल्लाह एक है 

📕 पारा 30,सूरह अहद,आयत 1
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शिया अक़ायद - तमाम सहाबा सिवाये तीन चार को छोड़कर सब मुर्तद हैं,माज़ अल्लाह 

📕 फरोग़े काफी,जिल्द 3,सफह 115

सुन्नी अक़ायद - और उन सबसे (सहाबा) अल्लाह जन्नत का वादा फरमा चुका 

📕 पारा 27 सूरह हदीद,आयत 10
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शिया अक़ायद - मौजूदा क़ुरान नाक़िस है और क़ाबिले हुज्जत नहीं,माज़ अल्लाह 

📕 उसूले काफी,जिल्द 1,सफह 26-263

सुन्नी अक़ायद - वो बुलंद मर्तबा किताब (क़ुरान) जिसमे शक की कोई गुंजाइश नहीं 

📕 पारा 1,सूरह बक़र,आयत 1
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शिया अक़ायद - मौजूदा क़ुरान तहरीफ शुदा है,माज़ अल्लाह

📕 हयातुल क़ुलूब,जिल्द 3,सफह 10

सुन्नी अक़ायद - बेशक हमने उतारा है ये क़ुरान और बेशक हम खुद इसके निगहबान हैं 

📕 पारा 14,सूरह हजर,आयत 8
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शिया अक़ायद - क़ुरान को हुज़ूर के विसाल के बाद जमा करना उसूलन गलत था 

📕 हज़ार तुम्हारी दस हमारी,सफह 560

सुन्नी अक़ायद - हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम ने अपनी ज़िन्दगी में ही क़ुरान को तरतीब दे दिया था लेकिन किताबी शक्ल में जमा करने की सआदत हज़रते अबू बक्र सिद्दीक़ को हासिल है 

📕 तफसीरे नईमी,जिल्द 1,सफह 114
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शिया अक़ायद - मर्तबये इमामत पैगम्बरी से अफज़ल व आला है,माज़ अल्लाह 

📕 हयातुल क़ुलूब,जिल्द 3,सफह 2

सुन्नी अक़ायद - जो किसी ग़ैरे नबी को नबी से अफज़ल बताये काफिर है 

📕 बहारे शरीयत,हिस्सा 1,सफह 15
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शिया अक़ायद - हज़रत आयशा का शरीयत से कुछ ताल्लुक़ नहीं और वो वाजिबुल क़त्ल हैं,माज़ अल्लाह

📕 शरियत और शियाइयत,सफह 45
📕 बागवाये बनी उमय्या और माविया,सफह 474

सुन्नी अक़ायद - हज़रते आयशा सिद्दीका की शानो अज़मत में अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने क़ुराने करीम की सूरह नूर में 17 या 18 आयतें नाज़िल फरमाई और उनसे 2210 हदीस मरवी है 

📕 मदारेजुन नुबूवत,जिल्द 2,सफह 808
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शिया अक़ायद - मौला अली का इमामत को तर्क कर देने से खुल्फाये सलासा मुर्तद हो गए,माज़ अल्लाह 

📕 उसूले काफी,जिल्द 1,सफह 420

सुन्नी अक़ायद - हुज़ूर ने अशरये मुबश्शिरा यानि 10 सहाबा इकराम का नाम लेकर जन्नती होने की गवाही दी जिनमें खुल्फाये सलासा भी शामिल हैं 

📕 इबने माजा,जिल्द 1,सफह 61
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शिया अक़ायद - हज़रत उमर बड़े बेहया थे,माज़ अल्लाह 

📕 नूरुल ईमान,सफह 75 

सुन्नी अक़ायद - हुज़ूर फरमाते हैं कि मेरे बाद अगर कोई नबी होता तो उमर होते

📕 तिर्मिज़ी,हदीस 3686 
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शिया अक़ायद - हज़रत उसमान गारत गर था और उनकी खिलाफत में फहहाशी का सिलसिला शुरू हुआ,माज़ अल्लाह 

📕 कशफुल इसरार,सफह 107

सुन्नी अक़ायद - हज़रते उसमान ग़नी शर्मिले तबियत के मालिक हैं 

📕 शाने सहाबा,सफह 114
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शिया अक़ायद - जिस ने एक बार मूता किया उसका मर्तबा हज़रते हुसैन के बराबर और जिसने दो बार मूता किया उसका मर्तबा हज़रते हसन के बराबर और जिसने तीन बार मूता किया उसका मर्तबा हज़रते अली के बराबर और जिसने चार बार मूता किया उसका मर्तबा नबी के बराबर हो जाता है 

📕 बुरहाने मूता व सवाबे मूता,सफह 52 

सुन्नी अक़ायद - मूता हराम है 

📕 तोहफये अस्नये अशरिया,सफह 67

*मूता एग्रीमेंट मैरिज को कहते हैं मतलब ये कि अगर निकाह से पहले कोई मुद्दत तय की गयी मसलन 1 दिन के लिए या 1 हफ्ते के लिए या 1 महीने के लिए या 1 साल के लिए गर्ज़ की कोई भी मुद्दत तय हुई कि इतने दिन के लिए हम शादी करते हैं तो ये निकाह हराम मिस्ल ज़िना है*
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जो कुछ मैंने यहां ज़िक्र किया वो तो बस चंद बातें हैं वरना इन काफिरों की किताबों में तो सैकड़ों ही कुफरी इबारतें भरी पड़ी है,अगर ऐसा अक़ीदा रखने वाले सिर्फ ज़बानी अहले बैत अतहार का नाम लें तो क्या उन्हें मुसलमान समझ लिया जायेगा नहीं और हरगिज़ नहीं,अब हदीसे पाक में इस जहन्नमी फिरके का तज़किरा भी पढ़ लीजिए मौला अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं कि

*आखिर ज़माने में एक क़ौम पाई जायेगी जिसका एक खास लक़ब होगा इन्हें राफजी कहा जायेगा ये हमारी जमात में होने का दावा करेगा मगर ये हम में से नहीं होगा इनकी पहचान ये होगी कि ये हज़रत अबु बकर व हज़रत उमर को बुरा कहेंगे* 

📕 कंज़ुल उम्माल,जिल्द 6,सफह 81

*राफजियों को काफिर कहना ज़रूरी है ये फिरका इस्लाम से खारिज है मुर्तदीन के हुक्म में है*

📕 फतावा आलमगीरी,जिल्द 3,सफह 264

जारी रहेगा...........

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