दस मुहर्रम की रात

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*🥀 दस मुहर्रम की रात (सिलसिला "करबला से मुतल्लिक़ कुछ झूटे वाक़ियात" से मुन्सलिक) 🥀*




दस मुहर्रमुल हराम की रात है........, मैदान -ए- करबला है........, रात का पहला हिस्सा है........, अहले बैत क़ुरआन की तिलावत में मसरूफ हैं........, हज़रते सकीना ने जब सब को क़ुरआन पढ़ते देखा तो मचल गयीं और अपने वालिद इमाम हुसैन के पास जाकर कहने लगीं कि अब्बा जान मुझे भी क़ुरआन शरीफ पढ़ाइये, चुनाँचे पानी ना होने की वजह से तयम्मुम करवा के "अऊज़ू बिल्लाह" और "बिस्मिल्लाह" पढ़ा और फिर ज़ारो क़तार रोने लगे।
जब वजह पूछी गयी तो इमाम हुसैन ने फरमाया कि क़ुरआन शुरू तो मैने करवा दिया है लेकिन ये सोच कर रहा हूँ कि खत्म कौन करवायेगा।

ये वाक़िया शायद हम अच्छी तरह से लिख नहीं पाये लेकिन हमारे मुक़र्रिरीन बहुत अच्छे तरीक़े से इसे बयान करते हैं, खूब रोते हैं और बेचारी आवाम भी अपने आँसुओं को रोक नहीं पाती, और रोके भी कैसे कि वाक़िये में दर्द ही इतना है।

इस दर्दनाक क़िस्से के बारे में हज़रते अल्लामा मुफ्ती शरीफुल हक अमजदी रहीमहुल्लाह लिखते हैं कि जिस कज़्ज़ाब और जाल साज़ मुक़र्रिर ने इसे बयान किया उस से पूछा जाये कि उस ने कहाँ देखा। आवाम भी ऐसे फकड़ बाज़ और चर्ब ज़ुबान मुक़र्रिर को सर पर बिठाती है, मूँह माँगी फीस देती है, उस के मुक़ाबिल उलमा को घास तक नहीं डालती, आखिर इन जाल साज़ोंं की इस्लाह कैसे होगी?
इस रिवायत को बयान करने वाला जाल साज़ मुक़र्रिर अगर ज़िन्दा है तो उस से पूछा जाये कि तुम ने ये रिवायत कहाँ देखी है?

(ملتقطاً و ملخصاً: فتاوی شارح بخاری، ج2، ص72) 

ये रिवायत मनघढ़त और झूटी है और इस को बयान करने वाला मुक़र्रिर ........, बहुत हो गया, अब हम क्या कहें।




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*🏁 MASLAKE AALA HAZRAT 🔴*

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