इमाम मुस्लिम बिन अकील के बच्चों का झुटा किस्सा
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*🥀 इमाम मुस्लिम बिन अक़ील के बच्चों का झुटा क़िस्सा (सिलसिला "करबला के कुछ झुटे वाक़ियात से मुन्सलिक") 🥀*
वाक़िया -ए- करबला में जो किस्से कहानियां दाखिल हो गयी या जिन मनघड़ंत वाक़ियात को वाक़िया -ए- करबला के साथ जोड़ा गया उन में से इमाम मुस्लिम बिन अक़ील के बच्चों का वाक़िया बहुत मशहूर है।
इस वाक़िये को इतनी शोहरत हासिल हुई की उर्दू ज़ुबान में वाक़िया -ए- करबला पर लिखी जाने वाली तक़रीबन हर किताब में ये मौजूद है, यहां तक कि बाज़ मोतबर मुसन्निफ़ीन ने भी अपनी किताबो में इसे नक़्ल किया है।
जिन किताबो में ये वाक़िया लिखा गया है, उन की तादाद 100 के क़रीब है।
ये तमाम कुतुब वाक़िया -ए- करबला के पेश आने के सैकड़ो बल्कि हज़ार साल बाद लिखी गयी है तो जाहिर सी बात है कि लिखने वालों ने कहीं से अखज़ किया होगा और वो माखज़ (Source) ही हमे हक़ीक़त बता सकता है लिहाज़ा अब हमें ये देखना होगा कि इस का असल माखज़ क्या है?
वो तमाम कुतुब जिन में ये वाक़िया दर्ज है, उन्हें हम तीन हिस्सों में बाँट सकते है। पहली तो वो किताबे है जिन में किसी किताब का हवाला नही है, बस वाक़िया मौजूद है,
दूसरी वो है जिन में माज़ी क़रीब में लिखी जाने वाली किसी किताब का हवाला दिया गया है, और तीसरी वो है जिन में एक ऐसे माखज़ का ज़िक्र किया गया है जो इस वाक़िये का असल मरकज़ है।
पहली दो क़िस्मों को अलग करते हैं क्योंकि वो असल माखज़ तक मुअविन नहीं बन सकतीं।
अब जो तीसरी क़िस्म की किताबे हैं उन में जिस माखज़ का ज़िक्र है वो "रौजातुश शुहदा" नामी किताब है।
ये किताब फारसी ज़ुबान में है और मुसन्निफ़ का नाम मुल्ला हुसैन बिन अली काशफ़ी है जिस का इंतिक़ाल 910 हिजरी में हुआ, यही वो सब से पहला शख़्स है जिस ने इस मनघढ़ंत किस्से को बयान किया है वरना क़ुतुब -ए- तारीख में इस का कोई नामो निशान नहीं था।
एक शिया मिर्ज़ा तक़ी लिसान ने भी इस बात का एतिराफ़ किया है कि सब से पहले इमाम मुस्लिम के बच्चों की शहादत का वाक़िया "रौजातुश शुहदा" में बयान किया गया है और पहले मोअर्रिखीन में सिर्फ आसिम कूफ़ी ने बच्चो का तज़किरा किया है वो भी नाम लिए बगैर और शहादत का कोई ज़िक्र नही किया।
मिर्ज़ा तक़ी ने एक किताब के हवाले से ये तक लिखा है के इमाम हुसैन की शहादत के बाद जब अहले बैत को क़ैदी बना कर लाया गया तो इमाम मुस्लिम के छोटे साहबज़ादे उन के साथ क़ैदी थे।
इस वाक़िये के सिलसिले में "रौजतुश शुहदा" पहली किताब है।
इस किताब और साहिब -ए- किताब पर हम तफसील से कलाम करेंगे लेकिन उस से पहले तारीख की रौशनी में इस वाक़िये की हक़ीक़त को मुलाहिज़ा फरमाएं जिसे मुहक़्क़िक -ए- अहले सुन्नत, हज़रत अल्लामा मुहम्मद अली नक़्शबन्दी रहीमहुल्लाह त'आला ने बयान किया है :
अल्लामा इब्ने असीर जज़री लिखते है कि इमाम मुस्लिम बिन अक़ील (जब कूफ़ा की तरफ रवाना हुए तो पहले) मदीने में रसूलुल्लाह ﷺ की मस्जिद में गए और नमाज़ अदा करने के बाद दो रास्ता बताने वालों को उजरत पर ले कर उन के साथ (जानिब -ए- कूफ़ा) चल पड़े रास्ते मे सब को बहुत ज़्यादा प्यास लगी जिस की वजह से वो दोनों मर गए और मरते वक़्त इमाम मुस्लिम को पानी का रास्ता बता गए।
(الکامل فی التاریخ، ج4، ص21، مطبوعہ بیروت)
ये ऐसी किताब का हवाला है जिसे शिया व सुन्नी दोनों मुअतबर जानते है। इस मे इमाम मुस्लिम के बच्चो का कहीं कोई ज़िक्र नही है, इमाम मुस्लिम का मदीना जाना, रास्ते मे प्यास लगना, दोनों रास्ता बताने वालों की मौत हो जाना, इस पूरे वाक़िये में इमाम मुस्लिम का बच्चो को साथ ले जाना मज़कूर नही है।
अगर बच्चे साथ थे तो कहीं तो ज़िक्र होना चाहिये था? खुसूसन प्यास के वक़्त उन की हालत का ज़िक्र होना चाहिये था।
अल्लामा इब्ने खलदून, अल्लामा इब्ने कसीर और तबरी ने भी इमाम मुस्लिम बिन अक़ील के बच्चों का ज़िक्र नहीं किया हालाँकि मदीना जाने, रास्ता बताने वालों को साथ लेने और प्यास की शिद्दत से इन्तिक़ाल कर जाने का तज़्किरा किया है।
(تاریخ ابن کثیر، ج8، ص198۔ تاریخ ابن خلدون، ج2، ص512۔ تاریخ طبری، ج4، ص147)
कुतुब -ए- तारीख में इमाम मुस्लिम का अपने बच्चों को साथ ले जाना ही साबित नहीं है।
इस के इलावा शियों की मुअतबर कुतुब में भी इस का सुबूत नहीं है।
शियों की सब से बड़ी और ज़खीम किताब "बिहारुल अनवार" जो 110 जिल्दों पर मुश्तमिल है, उस में भी इमाम मुस्लिम बिन अक़ील और रास्ता बताने वालों का तो ज़िक्र है लेकिन बच्चों का कोई तज़्किरा नहीं है।
(بحار الانوار، ج44، ص335، مطبوعہ تہران)
तारीख की दीगर किताबों में भी इमाम मुस्लिम के बच्चों का कोई ज़िक्र नहीं है। जिस से साफ ज़ाहिर होता है कि ये क़िस्सा जो हमारे दरमियान मशहूर है ये महज़ एक अफसाना है जिसे रोने रुलाने के लिये घढ़ा गया है।
जो दलाईल पेश किये गये वो इस वाक़िये की तरदीद के लिये काफी है और इन के इलावा इमाम मुस्लिम की वसीयत भी क़ाबिल -ए- गौर है जिस का ज़िक्र सुन्नी वा शिया दोनो तरफ की कुतुब में मौजूद है, चुनाँचे इमाम मुस्लिम ने शहीद होने से पहले चंद वसीयतें फरमायी और वो ये तीन हैं :
(1) इस शहर (कूफा) में जो मेरा क़र्ज़ है उसे अदा कर दिया जाये।
(2) शहादत के बाद मेरे जिस्म को ज़मीन में दफ्न कर दिया जाये।
(3) किसी को भेज कर इमाम हुसैन को वापस जाने का पैगाम दे दिया जाये।
(البدایۃ والنھایۃ، ج8، ص56، مطبوعہ بیروت۔
کتاب الفتوخ تصنیف احمد بن عاصم الکوفی، ص99، مطبوعہ حیدرآباد دکن۔
الکامل فی التاریخ، ج4، ص34، مطبوعہ بیروت۔
مقتل حسین مصنفہ ابو المؤید خوارزمی، ص212، مطبوعہ ایران۔
تاریخ طبری، ج6، ص212، مطبوعہ بیروت۔
ناسخ التواریخ، ج2، ص98، مطبوعہ تہران جدید)
यहाँ गौर करने की बात ये है कि जब इमाम मुस्लिम अपने क़र्ज़ और अपने जिस्म के लिये वसीयत कर रहे हैं तो फिर अपने बच्चों को कैसे भूल गये?
इमाम मुस्लिम बिन अक़ील की वसीयत में ये बात ज़रूर मौजूद होनी चाहिये थी कि मेरे बच्चों को फुलाँ जगह पहुँचा दिया जाये लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं है, बेशक इमाम मुस्लिम अपने बच्चों से मुहब्बत करते थे तो ऐसा कैसे हो सकता है कि आप उन्हें भूल जायें?
मज़्कूरा तमाम बातों से ये साबित होता है कि इमाम मुस्लिम का अपने बच्चों को कूफा ले जाना, उन बच्चों का यहाँ से वहाँ भटकना और शहीद कर दिया जाना सब क़िस्से कहानियाँ बे असल वा मनघढ़त हैं।
इस क़िस्से को सबसे पहले मुल्ला हुसैन वायिज़ कश्फी ने रौज़तुश शुहदा में लिखा है और आप को शायद ये बात कड़वी लगे लेकिन सच ये है कि मुल्ला हुसैन कश्फी सुन्नी नहीं बल्कि अहले तशय्यु था, ये और इस की किताब अहले सुन्नत के नज़दीक कोई हुज्जत नहीं।
इस मुकम्मल बहस के बाद भी अगर कोई इमाम मुस्लिम के बच्चों के इस क़िस्से को रौज़तुश शुहदा में होने की वजह से हज़म कर लेता है तो उसे चाहिए कि इसी किताब में मौजूद दीगर वाक़ियात को भी हज़म कर के दिखाये जिन में से कुछ मज़ेदार वाक़ियात हमारे एक दूसरे क़िस्त-वार मज़मून "इसे भी हज़म कीजिये" में मौजूद हैं, वहाँ मुलाहिज़ा फरमायें।
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*🏁 MASLAKE AALA HAZRAT 🔴*
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