माहे मुहर्रम में रोना धोना

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*🥀 माहे मुहर्रम में रोना धोना 🥀*





मुझे रोना नही आता तो क्या कोई ज़बरदस्ती है?
जी जी बिल्कुल आप को रोना ही पड़ेगा, अगर नही रोये तो इस का मतलब आप को अहले बैत से मुहब्बत नहीं है।
आप नहीं रो सकते तो हमारे पास आयें हम आप को ऐसे क़िस्से सुनायेंगे जिन्हें सुनने के बाद आप अपने आँसू को रोक नहीं पायेंगे और नहीं तो कुछ भी करें लेकिन रोयें।

माहे मुहर्रम को कुछ लोगों ने माहे मातम समझ लिया है। रोना ज़रूरी है, शादी नहीं कर सकते, मुबारकबाद नहीं देनी है, गोश्त नहीं खाना है और फुलाँ नहीं छूना है........, ये सब क्या ड्रामा है?

ये ज़बरदस्ती रोने धोने का ड्रामा करने वालो को जान लेना चाहिए के किसी प्यारे की वफात पर क़तई तौर पर रोना आ जाना मुहब्बत है और रहम के जज़बे का नतीजा है और ये बिल्कुल दुरुस्त और जाइज़ है लेकिन हर साल रोने रुलाने के लिए बैठ जाना एक अजीब हरकत है।

इस दुनिया में हर किसी की बहन भाई, माँ बाप, अवलाद और रिश्तेदार फौत होते रहते हैं, मुर्शिद वा उस्ताद फौत होते रहते हैं, इन सब के लिये इसाल -ए- सवाब का सिलसिला ज़िन्दगी भर जारी रहता है मगर साल के साल रोने का धंधा नहीं किया जाता।

हज़रते अली रदिअल्लाहु त'आला अन्हु रमज़ान में शहीद किये गये, हज़रते उसमान गनी रदिअल्लाहु त'आला अन्हु को कई दिनों तक उन के घर में महसूर कर के और उन का पानी बन्द करके प्यास की हालत में शहीद कर दिया गया, हज़रते उमर फारूक़ रदिअल्लाहु त'आला अन्हु को मस्जिदे नबवी में नमाज़ पढ़ते हुये छुरा मार कर शहीद कर दिया गया........., ज़ुल्म की ये दास्तानें एक से बढ़ कर एक है। इन में से किसी एक से मौक़े पर हम साल के साल ना मातम करते हैं और ना रोते हैं।

चलें सब को छोड़ दें, अहादीस में आता है कि दुनिया का सब से तारीक दिन वो था जिस दिन रहमत -ए- आलम ﷺ इस दुनिया से रुख्सत हुये, अगर हर साल गम मनाना और रोना रुलाना जाइज़ होता तो अल्लाह की अज़मत की क़सम रबीउल अव्वल के महीने में हर साल पूरी दुनिया में कोहराम बरपा हो जाया करता।
अब हम हर साल मीलाद -ए- मुस्तफा की खुशी तो ज़रूर मनाते हैं मगर विसाल की वजह से ना मातम करते हैं और ना तो सिर्फ रोते हैं।

जो लोग अहले सुन्नत पर ये इल्ज़ाम लगाते हैं कि ये इमाम हुसैन से मुहब्बत नहीं करते, उन्हें गौर करना चाहिये कि अहले सुन्नत की हुज़ूर -ए- अकरम ﷺ के साथ मुहब्बत को तो कोई माँ का लाल चेलेन्ज नहीं कर सकता, आखिर हुज़ूर के विसाल के मौक़े पर हम क्यों नहीं रोते?

यहाँ से बात निखर कर सामने आ जाती है कि हर साल रोने धोने बैठ जाना एक गौर शरई हरकत है और जो लोग सुन्नी कहलाने के बावजूद हर साल ये धंधा करते हैं उन्हें रवाफिज़ का टीका लग चुका है।

अल्लाह के प्यारों का तरीक़ा तो ये है कि प्यारों की एन वफात के दिन भी सब्रो तहम्मुल से काम लेते हैं और आँसुओं पर भी कंट्रोल रखने की पूरी कोशिश करते हैं, हाँ अलबत्ता बे इख्तियार आँसू निकल आना एक अलग बात है।

अगर किसी को इत्तिफाक़िया रोना आ जाये तो ऐसे रोने में कोई क़बाहत नहीं लेकिन तकल्लुफ के साथ जान बूझ कर रोने धोने बैठ जाना और इसे गमे हुसैन में रोना समझ कर सवाब की उम्मीद रखना बिल्कुल गलत है।

(انظر: سانحۂ کربلا، علامہ غلام رسول قاسمی نقشبندی) 





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*🏁 MASLAKE AALA HAZRAT 🔴*

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