मरजल बहरैन औरअल लुलू वल मरजान
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*🥀 मरजल बहरैन और अल लूलू वल मरजान 🥀*
कुछ नया होना चाहिए, इस चक्कर मे बाज़ मुक़र्रिरीन जो पाते है बयान कर देते हैं, ये भी नही देखते कि जो बयान कर रहे हैं वो किस हद तक दुरुस्त है।
बाज़ लोग क़ुरआन -ए- पाक की सूरह -ए- रहमान में वारिद हुये लफ्ज़ "मरजल बहरैन" से हज़रते अली व हज़रते फातिमा मुराद लेते हैं और "अल लूलू वल मरजान" से हसनैन करीमैन को मुराद लेते हैं हालाँकि ये सहीह नहीं है।
शैखुल हदीस, हज़रते अल्लामा गुलाम रसूल क़ासमी लिखते हैं :
अल्लामा जलालुद्दीन सुयूती रहीमहुल्लाह फ़रमाते हैं कि ये जाहिलाना तावील है जो शियों ने की है।
(الاتقان فی علوم القرآن، ج2، ص180)
मुल्ला अली क़ारी रहीमहुल्लाह ने लिखा है कि "मरजल बहरैन" और "अल लूलू वल मरजान" की ये तावील शिया जैसे जाहिल और अहमक़ लोगों का काम है।
(مرقاۃ، ج1، ص292)
अल्लामा इब्ने तैमिया ने लिखा है कि ये तफसीर शियों ने घढ़ी है।
(مقدمہ تفسیر ابن تیمیہ، ص29)
(انظر: سانحۂ کربلا، ص16)
अल्लामा गुलाम रसूल क़ासमी एक दूसरे मक़ाम पर लिखते हैं:
इस तावील के बारे में उलमा ने साफ लिखा है कि ये जाहिलों और अहमक़ों की तावील है जैसे रवाफिज़।
(الاتقان للسیوطی، مرقاۃ للقاری، مجمع البحار، فیض القدیر)
(انظر: اصلاح امت، ص11)
ये तावील कुछ किताबों में भी देखने को मिलती है।
शहीद इब्ने शहीद नामी किताब में इस का मिलना कोई बड़ी बात नहीं लेकिन चंद मुअतबर उलमा ने भी इसे फज़ाइल -ए- अहले बैत के ज़िमन में नक़ल कर दिया है जो एक खता है।
यक़ीनन उन से ऐसा अदम -ए- तवज्जोह की वजह से हुआ है लेकिन अब जब मालूम हो जाये तो फिर इसे बयान करना जहालत के सिवा कुछ नहीं है।
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*🏁 MASLAKE AALA HAZRAT 🔴*
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