हज़रते हसन ए मुजतबा का कौम पर एहसान*

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     *🥀 दास्तानें करबला 🥀* 



           ❗️ *पोस्ट- 8* ❗️

*हज़रते हसन ए मुजतबा का कौम पर एहसान*

🤺 *हज़रत इमाम हसन* रदीअल्लाहु तआला अन्हु के तख्ते खिलाफत संभाल ने के बाद, आपने देखा कि उम्मते मुस्लिमा *दो हुकूमतो* में तकसीम है। और दोनों में जंग भी हो चुकी है. लिहाजा अगर ऐसा ही चलता रहा तो उम्मत हमेशा दो हिस्सों में बटी रेह जाएगी ।  

🤝 इसलिये हज़रत इमामे हसन रदीअल्लाहु तआला अन्हु ने *उम्मते मुस्लिमा को एक करने के लिए और क़ुव्वते इस्लाम को बढ़ाने की खातिर* हजरत मुआविया रदीअल्लाहु तआला अन्हु की बैत को कुबूल कर ली और अपनी खिलाफत से दस्त बरदा हो गए । और इस तरह सय्यिदना हसन मुजतबा की कुर्बानी से *हुकूमते इस्लामीया फिर से एक जगह पर यक्जा (जमा) हो गई।* आलमे इस्लाम की हुकूमत का एक ही जगह मरकज हो गया। अब वोह हुकूमत तो रहीं लेकिन खिलाफते राशिदा ना बन सकी जिसका बयान हुज़ूर ने अपनी पेंशनगोई में किया था। 

           आपकी बैत से खवारिज लोग घबरा उठे, उनके मनसूबों पर पानी फिर गया जिनका मनसूबा था कि उम्मते मुस्लिमा को आपस में लडवा कर हुकूमत को हड़पने का चल रहा था।

☘️ इस बैत से *हुज़ूर सल्लललाहो अलैहि वसल्लम की ऐक और पेशनगोई मुकम्मल हुई* जो आप ने हज़रते हसन रदीअल्लाहु तआला अन्हु के बारे में फरमाई थी कि: 

           "येह मेरा फरजंद सय्यद (सरदार) है और अल्लाह त‘आला इस की बदौलत *मुसलमानों की दो जमाअतों में सुलह करेगा।"*

❗ इस तरह हज़रत हसन रदीअल्लाहु तआला अन्हु की बैत करने से खिलाफते रशीदा का 30 साल का दौर मुकम्मल हो गया। और इस्लामी सलतनत मलूकियत (ownership) की शकल में आगे चल पड़ी।  

🤝 हज़रते हसन रदीअल्लाहु तआला अन्हु और हज़रत मुआविया रदीअल्लाहु तआला अन्हु के बिच *एक मुआहदा (contract) हुआ जिसमे ये तय हुआ :*

1️⃣ हज़रते मुआविया अपना दौरे हुकुमत ख़त्म होने के बाद अपना कोई जानशीन नामजद नहीं करेंगे और इस हुकूमत को दोबारा उम्मतें मुस्लिमा की और लौटा देंगे और उम्मत अपने खलीफा का मुन्तख़ब वैसे ही करेगी जैसे इमाम हसन मुन्तख़ब हुवे थे यानी खुलफाए राशिदीन के तरीके पर।

2️⃣ अहले मदीना और अहले हिजाज और अहले इराक में किसी शख्स से भी जमाना ए हज़रत अली रदीअल्लाहु तआला अन्हु के मुतल्लिक कोई मुआखजा और मुतालबा ना किया जाए। 

3️⃣ अमीर मुआविया रदीअल्लाहु तआला अन्हु हज़रत इमामे हसन रदीअल्लाहु तआला अन्हु के दुयून को अदा करें। 

ये वाक़िआ रबीउल अव्वल सि. 41 हिजरी का है।

*⌛ (बाकी अगली पोस्ट में इंशा अल्लाह)*



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