इमामे मज़्लूम رضی اللہ عنہ से मदीना छूट रहा है।*

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*🥀 वाक़यात-ए-कर्बला 🥀* 



*⌛(किस्त न० 03)* 

✏️ *इमामे मज़्लूम رضی اللہ عنہ से मदीना छूट रहा है।* 

      इमामे हसन رضی اللہ عنہ का काम तमाम करके जब यज़ीद पलीद ने अपने दिल को ख़ुश कर लिया अब इस शक़ी को इमामे हुसैन رضی اللہ عنہ याद आए। मदीने के सूबेदार वलीद को ख़त लिखा कि।

      हुसैन और अब्दुल्लाह इब्ने उ़मर और अब्दुल्लाह इब्ने ज़ुबैर رضی اللہ عنہم से बैअ़त के लिए कहे और मोहलत ना दे। इब्ने उ़मर एक मस्जिद में बैठने वाले आदमी हैं और इब्ने ज़ुबैर जब तक मौक़ा ना पाएंगे ख़ामोश रहेंगे, हां हुसैन رضی اللہ عنہ से बैअ़त लेनी सबसे ज़्यादा ज़रूरी है। कि यह शेर और शेर का बेटा मौक़े का इंतज़ार ना करेगा।

      सूबेदार ने ख़त पढ़ने के बाद पयामी भेजा। इमाम ने फ़रमाया: "चलो आते हैं।" फिर अब्दुल्लाह इब्ने ज़ुबैर से फ़रमाया: "दरबार का वक़्त नहीं, बेवक़्त बुलाने से मालूम होता है की सरदार ने वफ़ात पाई। हमें इसलिए बुलाया जाता है कि मौत की ख़बर मशहूर होने से पहले यज़ीद की बैअ़त हमसे ली जाए।" इब्ने ज़ुबैर ने अर्ज़ कि "मेरा भी यही ख़्याल है। ऐसी हालत में आपकी क्या राय है?" फ़रमाया: "मैं अपने जवान जम्अ करके जाता हूं। साथियों को दरवाजे पर बिठाकर उसके पास जाऊंगा।" इब्ने ज़ुबैर ने कहा: "मुझे उसकी तरफ़ से अंदेशा है।" फ़रमाया: "वह मेरा कुछ नहीं कर सकता।" फिर अपने अस्हाब के साथ तशरीफ़ ले गए। और हमराहीयों को समझा दिया जब मैं बुलाऊं या मेरी आवाज़ बुलंद हो तो अंदर चले आना और जब तक मैं वापस ना आऊं कहीं ना जाना। यह फ़रमा कर अंदर तशरीफ़ ले गए। वलीद के पास मरवान भी बैठा पाया।

      ख़त पढ़कर सुनाया गया। मज़मून वही पाया जो हुज़ूर का ख़्याल था। बैअ़त का हाल सुन कर फ़रमाया: "मुझ जैसे छुप कर बैअ़त नहीं करते। सबको जम्अ़ करो। बैअ़त लो। फिर हमसे कहो।" वलीद ने कहा: "बेहतर। तशरीफ़ ले जाएं।" मरवान बोला: "अगर इस वक़्त इन्हें छोड़ देगा और बैअ़त ना लेगा तो जब तक बहुत सी जानों का ख़ून ना हो जाए ऐसा वक़्त हाथ ना आएगा। अभी रोक ले, बैअ़त कर ले, तो ठीक। वरना गर्दन मार दे।" यह सुनकर इमाम رضی اللہ عنہ ने फ़रमाया: इब्नुज़्ज़ुरक़ा! "तू या वो क्या मुझे क़त्ल कर सकता है? खुदा की क़सम तूने झूठ कहा। और पाजीपन की बात की।" यह फ़रमा कर वापस तशरीफ़ लाए।


      मरवान ने वलिद से कहा: "ख़ुदा की क़सम अब ऐसा मौक़ा दोबारा ना मिलेगा।" वलीद बोला: "मुझे पसंद नहीं कि बैअ़त ना करने पर हुसैन رضی اللہ عنہ को क़त्ल करूं। मुझे तमाम जहान की बादशाहत और माल के बदले में भी हुसैन رضی اللہ عنہ का क़त्ल मंज़ूर नहीं। मेरे नज़दीक हुसैन के खून का जिस शख़्स से मुतालबा होगा वह क़यामत के दिन अल्लाह के सामने हल्की तोल वाला है।" मरवान ने मुनाफिक़ाना तौर पर कहा: "तू ने ठीक कहा।"

      इमामे मज़्लूम رضی اللہ عنہ के पास दोबारा आदमी आया। आपने फ़रमाया: "सुबह होने दो।" और इरादा फरमाया कि रात को मदीना छोड़कर मक्का चले जाएंगे।

      यह रात इमाम رضی اللہ عنہ ने अपने नाना जान ﷺ के रौज़ए मुनव्वर पर गुज़ारी। उधर इमाम के बेटे, भाई, भतीजे, घर वाले सवार हैं। इधर इमाम मस्जिद-ए-नबवी से बाहर तशरीफ़ लाए।

      जिस जगह आप का बचपना गुज़रा, जिस जगह आपके नाना जान ﷺ और आपकी प्यारी मां जलवागर हैं। वह शहर के जहां आपके नाना जान ﷺ हिज्रत करके आए तो हर तरफ़ खुशी का माहौल था। बच्चे-बच्चियां रास्ते में ख़ुशी से शोर-गुल मचा रहे थे। और पूरा शहर ख़ुशी में डूबा हुआ था। आज वह शहर आप पर तंग हो चुका था। दिल तो नहीं चाहता था। लेकिन मजबूरन आपको मदीना छोड़ना पड़ रहा था। आप की आंखें नम और दिल परेशान है।

      क़ाफ़िला मदीने से रवाना होता है। मस्जिद-ए-नबवी के मीनार आप को सलाम अ़र्ज़ करते हैं। मदीने में अहले बैत رضی اللہ عنہم से हज़रते सुग़रा (इमामे मज़्लूम की साहिबज़ादी) और जनाब मोहम्मद बिन ह़नफ़िय्या (मौला अली رضی اللہ عنہ के बेटे) बाकी रह गए।

      रास्ते में अब्दुल्लाह बिन मुतीअ़ رضی اللہ عنہ मिले, अ़र्ज़ कि: "कहां का इरादा फ़रमाया।" इमाम ने फ़रमाया: "फिलहाल मक्का का।" अब्दुल्लाह बिन मुतीअ़ ने अर्ज़ कि: "कूफ़े का इरादा ना फ़रमाया जाए। वह बड़ा बै-ढंगा शहर है। जहां आपके वालिद शहीद हुए। आपके भाई से दगा की गई। आप मक्के के सिवा कहीं का इरादा ना फ़रमाए़। अगर आप शहीद हो जाएंगे तो ख़ुदा की क़सम हमारा ठिकाना ना लगा रहेगा। हम सब ग़ुलाम बना लिए जाएंगे।

      आख़िर ह़ुज़ूर मक्का पहुंचकर 7 जिलहिज्जा तक अम्नो अमान के साथ क़याम फ़रमा रहे।

 *(📚 आईनए क़यामत, पेज न० 24 से 30 तक)* 

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