इमाम मज़्लूम رضی اللہ عنہ मक्का से कूफ़ा रवाना हुए।*
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*🥀 वाक़यात-ए-कर्बला 🥀*
*⌛(किस्त न० 05)*
✏️ *इमाम मज़्लूम رضی اللہ عنہ मक्का से कूफ़ा रवाना हुए।*
सन् 60 हिजरी का आख़री महीना चल रहा था। हज का ज़माना था। दुनिया के दूर दराज़ हिस्सों से लाखों मुसलमान वतन छोड़कर हज के लिए आ रहे थे। इधर इमाम हुसैन رضی اللہ عنہ कूफ़ा का इरादा फ़रमा रहे थे। और वहां होते हुए भी इस हज में शरीक ना रह सके।
और इमाम मज़्लूम رضی اللہ عنہ ने बकरा ईद की आठवीं तारीख़ को कूफ़े का इरादा फ़रमा लिया।
जब यह ख़बर मशहूर हुई तो उमर बिन अब्दुर्रहमान رضی اللہ عنہ ने जाने से मना किया। इमाम मज़्लूम رضی اللہ عنہ ने फरमाया: "जो होनी है, हो कर रहेगी।"
अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास رضی اللہ عنہ ने निहायत आ़जिज़ी से रोकना चाहा और अ़र्ज़ कि "कुछ दिनों रुक जाएं और इंतजार करें। अगर कूफ़ी इब्ने ज़ियाद को कत्ल कर दें और दुश्मनों को निकाल बाहर करें। तो जानिए के नेक नियत से बुलाते हैं। और अगर वहां दुश्मन मौजूद हैं जो हरगिज़ वह हुज़ूर को भलाई की तरफ़ नहीं बुलाते हैं। मैं अंदेशा करता हूं कि यह बुलाने वाले ही मुक़ाबले में आएंगे।" फ़रमाया: "मैं इस्तिख़ारा करूंगा।" अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास رضی اللہ عنہ फिर कहने लगे: "भाई सब्र करना चाहता हूं मगर सब्र नहीं आता। मुझे इस रवानगी में आप के शहीद होने का अंदेशा है। इराक़ी बद-अहद है। आपके बाप को शहीद किया, आपके भाई का साथ न दिया, आप अरब वालों के सरदार हैं। अरब में ही क़ायम फ़रमाएं। इराक वालों को लिखें कि वह इब्न ज़ियाद को निकाल दें अगर ऐसा हो जाए तो तशरीफ़ ले जाएं। और अगर जाना ही है तो यमन का इरादा फ़रमाएं कि वहां किले और घाटियां हैं। वह मुल्क वसीअ़ ज़मीन रखता है।" फ़रमाया: "भाई! खुदा की क़सम, मैं आपको मेहरबान जानता हूं। मगर मैं तो पक्का इरादा बना चुका हूं।" अ़र्ज़ की: "बीवियों और बच्चों को तो साथ ना ले जाएं" यह भी मंज़ूर नहीं हुआ।
अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास رضی اللہ عنہ रोने लगे। अब्दुल्लाह इब्ने उमर ने मना किया। ना माने। पेशानी मुबारक पर बोसा देकर कहा: "ए शहीद होने वाले! मैं तुम्हें ख़ुदा को सौंपता हूं।"
अब्दुल्लाह इब्ने ज़ुबैर رضی اللہ عنہ ने रोकने की कोशिश की लेकिन आप ना माने। जब आप रवाना होने लगे तो आपके चचाज़ाद भाई हज़रते अब्दुल्लाह इब्ने जाफ़र त़य्यार رضی اللہ عنہ का ख़त मिला। ज़रा ठहरिए मैं भी आता हूं।
ह़ज़रते अब्दुल्लाह رضی اللہ عنہ ने अम्र बिन सईद मक्का के हाकिम से इमामे मज़्लूम رضی اللہ عنہ के लिए अमान और वापसी की मांग की। उन्होंने लिख भी दिया। लेकिन आप ना माने और फ़रमाया: "मैंने रसूल ﷺ को ख़्वाब में देखा है। और मुझे एक हुक्म दिया गया है, उसको पूरा करूंगा, चाहे सर जाए या रहे।" पूछा गया: "वह हुक्म क्या है?" फ़रमाया: "जब तक ज़िंदा हूं किसी से ना कहूंगा।" और फिर रवाना हो गए।
जब इमाम के भाई इमाम मोहम्मद बिन ह़नफ़िय्या को रवाना होने की खबर पहुंची तो तश्त में वुज़ू फ़रमा रहे थे। और इस क़दर रोए की तश्त आसुओं से भर गया।
जब इब्ने ज़ियाद को इमाम हुसैन رضی اللہ عنہ की खबर मिली तो उसने क़ादिसिय्या से ख़फ़ान व कोहे लअ़लअ़ तक फौज से नाकाबंदी करा दी। इमाम मज़्लूम رضی اللہ عنہ ने क़ैस बिन मसहर को अपने आने की खबर देने के लिए भेजा। उनको सिपाहियों ने गिरफ्तार कर लिया और कहा के इमाम को गाली बके। उन्होंने यह गवारा ना किया और इब्ने ज़ियाद को ही बुरा भला कहा। फिर इन्हें शहीद कर दिया गया।
*📚 आईनए क़यामत, पेज न० 34 से 39 तक*
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