इमाम मज़्लूम رضی اللہ عنہ मक्का से कर्बला तक।*
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*🥀 वाक़यात-ए-कर्बला 🥀*
*⌛(किस्त न० 06)*
✏️ *इमाम मज़्लूम رضی اللہ عنہ मक्का से कर्बला तक।*
जब यह का़फ़िला आगे बढ़ा तो इब्ने अशअस का भेजा हुआ आदमी मिला। जो हज़रते मुस्लिम رضی اللہ عنہ की वसीयत पर अमल करने के लिए भेजा गया था। उस से हज़रते मुस्लिम رضی اللہ عنہ की शहादत की ख़बर मालूम होने पर इमाम رضی اللہ عنہ को साथियों ने क़सम दी कि यहां से पलट चलिए। मुस्लिम शहीद رضی اللہ عنہ के अज़ीज़ों ने कहा: "हम किसी तरह नहीं पलट सकते, या ख़ूने ना हक़ का बदला लेंगे, या मुस्लिम رضی اللہ عنہ से जा मिलेंगे।" इमाम ने फ़रमाया: "तुम्हारे बिना ज़िन्दा रहना बेकार है।" फिर जो लोग रास्ते में साथ हो लिए थे उनसे इमाम ने फरमाया: "कुफ़ियों ने हमें छोड़ दिया, अब जिसके मन में आए पलट जाए हमें कुछ ना गवार ना होगा।" ऐसा इसलिए कहा कि कुछ लोग इसलिए साथ हुए थे कि इमाम उस जगह जा रहे हैं जहां लोग इनकी बैअ़त कर चुके हैं। यह सुनकर कुछ लोग वापस हो गए।
रास्ते में हज़रते हुर मिले जो इमाम رضی اللہ عنہ को इब्ने ज़ियाद के पास ले जाने के लिए आए थे। इनसे बहुत सारी गुफ़्तुगू (बात-चीत) हुई। इमाम के हमराहीयों ने वापसी का मशवरा दिया। हुर ने मुखालिफ़त की। इतने में इब्ने ज़ियाद का एक आदमी ख़त लेकर आया। जिसमें लिखा था कि इमाम पर सख़्ती की जाए और वह आदमी हुर पर इब्ने ज़ियाद का जासूस था। जब इमाम ने सख़्त नाराज़गी का इज़हार किया। तो हुर ने कहा आप रात को किसी वक़्त यहां से चले जाएं। मैं इब्ने ज़ियाद को कुछ लिख भेजूंगा।
रात को इमाम अपने काफ़िले के साथ चले। कि सुबह को इन लोगों से कहीं दूर निकल चुके होंगे।
अब तक़दीर की ख़ूबयां देखिए। मज़्लूमों की सुबह हुई भी तो कहां? कर्बला के मैदान में। यह सन 61 हिजरी की दूसरी तारीख़ थी। सामने अ़म्र बिन सअ़्द लश्कर लेकर इमाम के मुकाबले पर आ गया था। इसको इब्ने ज़ियाद ने क़ुफ़्फ़ार-ए-दैलम के जिहाद पर मुकर्रर किया था। लेकिन इमाम رضی اللہ عنہ की ख़बर सुनकर इसे इधर भेज दिया। इसके लोगों ने इसे बहुत मना करा। लेकिन यह इब्ने ज़ियाद से इसके बदले में एक सूबे की हुकूमत के लालच में भागा चला आया। और 500 आदमियों को फ़ुरात के घाट पर भेज कर। साहिब-ए-कौसर ﷺ के बेटे पर पानी बंद करा दिया।
तीन-चार दिन कर्बला के मैदान में यूं ही गुज़रे। इमाम رضی اللہ عنہ और इब्ने सअ़्द के बीच बातें होती रहीं। एक दिन इब्ने सअ़्द ने इब्ने ज़ियाद को लिखा। इमाम رضی اللہ عنہ चाहते हैं कि उन्हें वापस जाने दिया जाए। या इन्हें यज़ीद के पास ले जाया जाए। या यह किसी इस्लामी सरहद पर चले जाएं। इब्ने ज़ियाद ने यह ख़त पढ़कर कहा: "बेहतर है।" लेकिन पास में बैठे शिमर ने भड़काया। इब्ने ज़ियाद ने शिमर की बातों में आकर इब्ने सअ़्द को शिमर के हाथों एक खत भेजा। और कहा अगर इब्ने सअ़्द तेरी बात मान ले तो ठीक। वरना तू लश्कर का सरदार बन जाना और उसका सर मेरे पास भेज देना। ख़त में लिखा था "मैंने तुझे हुसैन رضی اللہ عنہ का सिफारशी बनने के लिए नहीं भेजा। मैंने तुझे हुसैन رضی اللہ عنہ को बैअत पर राज़ी करने के लिए भेजा है। और अगर वह ना मानें तो उन्हें और उनके साथियों को कत्ल कर दे। अगर काम कर दिया तो फरमां बरदारी का इनाम मिलेगा। वरना यह लश्कर शिमर के लिए छोड़ दे।
जब शिमर खत लेकर इब्ने सअ़्द के पास आया। तो इब्ने सअ़्द ने कहा सुलह हो जाती, लेकिन तेरा बुरा हो तूने काम बिगाड़ दिया। शिमर ने कहा: "अब तेरा क्या इरादा है?" इब्ने सअ़्द ने कहा: "जो इब्ने ज़ियाद ने कहा।"
*📚 आईनए क़यामत, पेज न० 39 से 50 तक*
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