कर्बला में मुकाबले की तैयारी

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*🥀 वाक़यात-ए-कर्बला 🥀* 



*⌛(किस्त न० 07)* 

✏️ *कर्बला में मुकाबले की तैयारी* 

      मोहर्रम की 9 तारीख है नवास-ए-रसूल ﷺ, सरदार-ए-जन्नत, इमामे मज़्लूम رضی اللہ عنہ की आंख लग गई। ख़्वाब में देखा कि नाना जान ﷺ तशरीफ़ लाए हैं और सीने पर हाथ रख के दुआ़ फरमा रहे हैं "या अल्लाह हुसैन को सब्र अता फ़रमा।" फिर फ़रमाया "तुम जल्दी ही हम से आकर मिलोगे, अपना रोज़ा हमारे साथ इफ़्तार करोगे।" इमाम की आंख खुलती है फ़रमाते हैं कि दुश्मनों ने हमले की तैयारी कर ली है। फिर आप आज 9 तारीख की मोहलत मांग लेते हैं। मोहलत दे दी जाती है और इधर आप भी जंग की तैयारी में मसरूफ़ हो जाते हैं।

      इसके बाद आप हुक्म फ़रमाते हैं कि सारे ख़ैमे मिला दिए जाएं। ख़ैमों के पीछे खंदक खोदी जाए। और उसमें सूखी लकड़ियां भर दी जाएं। मुसलमान हुक्म पूरा करने के बाद हाज़िर होते हैं। इमाम मज़्लूम رضی اللہ عنہ फ़रमाते हैं: "कल हमें दुश्मनों से मिलना है। अभी रात बाकी है। मैंने तुम लोगों को खुशी खुशी इजाज़त दी, तुम लोग यहां से चले जाओ। और अपने साथ मेरे घर वालों में से एक एक को ले जाओ। तुम लोग आस-पास के गांव में फैल जाना। सुबह को दुश्मन जब मुझे पाएंगे तो पीछा ना करेंगे। अल्लाह तुम्हें बेहतर सिला अता फ़रमाए। यह सुनकर इमाम رضی اللہ عنہ के भाई, साहिबजा़दे, भतीजे, अब्दुल्लाह इब्ने जाफ़र के साहिबजा़दे ने अ़र्ज़ कि: "यह हम किस लिए करें ? इसलिए कि आप के बाद ज़िंदा रहें। खुदा हमें वह मनहूस दिन ना दिखाए। मुस्लिम शहीद رضی اللہ عنہ के भाइयों ने कहा:- और हम जाकर क्या कहेंगे! "यही के अपने सबसे बेहतर भाई, अपने आक़ा अपने सरदार को हम दुश्मनों के नरगे में अकेला छोड़ आए। उनके साथ ना तो तीर फेंका, ना नेज़ा मारा और ना तलवार चलाई। और हमें ख़बर भी ना हो कि हमारे जाने के बाद आप पर क्या गुज़री ? ख़ुदा की कसम हम हरगिज़ ऐसा ना करेंगे। अपनी जाने अपने बाल बच्चे आपके कदमों पर क़ुर्बान कर देंगे। मर जाएंगे। अल्लाह उस ज़िंदगी का बुरा करे जो आप के बाद हो।

      इस रात इमाम मज़्लूम رضی اللہ عنہ ने कुछ ऐसे शेर पढ़े जो हसरत और बेकसी की तस्वीर आंखों के सामने खींचने वाले थे। जिन्हें सुनकर ह़ज़रते ज़ैनब رضی اللہ عنہا बेताब होकर दौड़ी चली आईं। और चिल्लाती हुई दौड़ीं। "काश इस दिन से पहले मुझे मौत आ गई होती। मेरी मां फ़ातिमा इस दुनिया में नहीं, मेरे वालिद अ़ली ना रहे, मेरे भाई हसन का जनाज़ा उठा, ए हुसैन!! ए गुज़रे हुओं की निशानी!..... फिर बेहोश होकर गिर पड़ीं। आज मालिक-ए-कौसर के घर में इतना भी पानी नहीं कि मुंह पर छींटे देकर बहन को होश में लाया जा सके।

 *📚 आईनए क़यामत* 

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