यज़ीद का पहला वार और ह़ज़रते इमामे हसन رضی اللہ عنہ की शहादत

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*🥀 वाक़यात-ए-कर्बला 🥀* 



*⌛(किस्त न० 01)* 

✏️ *यज़ीद का पहला वार और ह़ज़रते इमामे हसन رضی اللہ عنہ की शहादत।।* 

      यज़ीद ख़बीस का पहला हमला सय्यिदुना इमामे हसन पर चला। जअ़्दा (ज़ौजए इमामे आ़ली मक़ाम) को बहकाया। कि अगर तू ज़हर देकर इमाम का काम तमाम कर देगी तो मैं तुझ से निकाह कर लूंगा। वह शाक़िया बादशाह-बेगम बनने की लालच में शाहाने जन्नत का साथ छोड़कर, जहन्नम की राह पर हो ली। कई बार ज़हर दिया कुछ असर ना हुआ, फिर तो जी खोलकर अपने पेट में जहन्नम के अंगारे भरे और इमामे जन्नत मक़ाम को सख़्त तेज़ ज़हर दिया। यहां तक कि मुस्त़फ़ा صلی اللہ علیہ وسلم के जिगर पारे के आ'ज़ाए बात़िनी पारा पारा होकर निकलने लगे।

      यह बेचैन होने वाली ख़बर सुनकर ह़ज़रते इमामे हुसैन رضی اللہ عنہ अपने प्यारे भाई के पास हाज़िर हुए। सिरहाने बैठकर गुज़ारिश की "ह़ज़रत को किसने ज़हर दिया?" फ़रमाया: "अगर वह है जो मेरे ख़्याल में है तो अल्लाह बड़ा बदला लेने वाला है। और अगर नहीं, तो मैं बेगुनाह से बदला नहीं चाहता।"

      एक रिवायत में है, फरमाया: "भाई! लोग हम से यह उम्मीद रखते हैं कि रोज़े क़यामत हम उनकी शफ़ाअ़त फ़रमा कर काम आएं, ना यह कि उनके साथ ग़ज़ब और इंतिकाम को काम में लाएं।

      फिर जाने वाले इमाम رضی اللہ عنہ ने आने वाले इमाम رضی اللہ عنہ को य़ू वसीयत फ़रमाई : "हुसैन ! देखो कूफ़ा वालों से डरते रहना, वह तुम्हें बातों में लेकर बुलाएं और वक़्त पर छोड़ दें, फिर पछताओगे और बचाओ का वक़्त गुज़र जाएगा।"

      बेशक इमामे आ़ली मक़ाम رضی اللہ عنہ की यह वसीयत मोतियों में तौलने और दिल पर लिख लेने के लायक़ थी। लेकिन उस होने वाले वाक़िए को कौन रोक सकता? जिसे क़ुदरत ने मुद्दतों पहले से मशहूर कर रखा था।

 *(📚 आईनए क़यामत, पेज न० 20,21)* 

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