जब झूट था तो लिखा क्यों (सिलसिला "करबला से मुतल्लिक़ कुछ झूटे वाक़ियात से" मुन्सलिक)

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*🥀 जब झूट था तो लिखा क्यों (सिलसिला "करबला से मुतल्लिक़ कुछ झूटे वाक़ियात से" मुन्सलिक) 🥀*



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जब दलाइल के साथ बताया जाता है कि फुलाँ वाक़िया झूटा है और मनघढ़त है तो कई लोग ये सवाल करते हैं कि जब झूट था तो फुलाँ आलिम ने लिखा क्यों?
ऐसे लोग शायद आलिम को मासूम समझते हैं या उन की लिखी हुई किताब को मिस्ले क़ुरआन समझते हैं कि इन में गलतियों का पाया जाना नामुमकिन है।

अकसर झूटे वाक़ियात जो आवाम में मशहूर हैं वो किसी ना किसी किताब में मौजूद ज़रूर होते हैं।
अगर ये मान लिया जाये कि सिर्फ किताब में मौजूद होना ही किसी वाक़िये की सहीह होने के लिये काफी है तो फिर हमें उन तमाम मौज़ू रिवायात को क़ुबूल करना पड़ेगा जो कुतुब -ए- तफसीर, कुतुब -ए- अहादीस, कुतुब -ए- सीरत, कुतुब -ए- तवारीख व कुतुब -ए- तसव्वुफ़ वगैरा में मौजूद हैं और तहक़ीक़ नाम की चीज़ दुनिया से उठ जायेगी।

होता ये है कि किताब लिखते वक़्त हर आलिम हर एक बात की छान बीन नहीं करता और मशहूर होने की वजह से कई बातें नक़ल कर देता है लेकिन तहक़ीक़ के बाद मालूम होता है कि वो सहीह नहीं थी। बाद मालूम होने के यही समझा जाता है कि लिखने वाले की तवज्जोह इस तरफ मब्ज़ूल नहीं हुई या उन्होने किसी और पर एतिमाद किया है या शोहरत की बिना पर नक़ल कर दिया है या इल'हाक़ (मिलावट) है लेकिन अब उसे सहीह साबित करने की कोशिश करना एक बहुत बड़ी गलती है।

वाक़िया -ए- करबला लिखने वालों के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ है कि जो सुना या कहीं पढ़ा नक़ल कर दिया, इस तरह शियों की रिवायात भी अहले सुन्नत की किताबों में आ गयी और बजाये उसे अलग करने के उस का दिफा करना असल में बदमज़हबों को मदद पहुँचाना है।



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