फातिमा सुगरा का झूटा किस्सा (सिलसिला "करबला के मुतल्लिक़ कुछ झूटे वाक़ियात" से मुन्सलिक)

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*🥀 फातिमा सुगरा का झूटा किस्सा (सिलसिला "करबला के मुतल्लिक़ कुछ झूटे वाक़ियात" से मुन्सलिक) 🥀*



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वाक़िया -ए- करबला को लिखने और बयान करने वालों में से बेशतर ने बगैर तहक़ीक़ किये महज़ नाक़िलाना रवैय्या इख्तियार किया है और कुछ ने तो गिरे पड़े क़िस्से कहानियों को भी नहीं छोड़ा और वाक़िया -ए- करबला के साथ जोड़ दिया। हज़रते फातिमा सुगरा की तरफ मंसूब क़िस्सा भी उन्हीं में से एक है।

इमाम हुसैन रदिअल्लाहु त'आला अन्हु की बेटी हज़रते फातिमा सुगरा के मुतल्लिक़ बयान किया जाता है कि जब इमाम हुसैन मदीना से रवाना हुये तो अपनी बेटी को यानी हज़रते फातिमा सुगरा को अकेला छोड़ दिया और मक्का -ए- मुकर्रमा फिर वहाँ से करबला तशरीफ़ ले गये।
इधर हज़रते फातिमा सुगरा मदीने में अकेली, बीमारी में मुब्तिला थीं और अपने बाबा के इंतिज़ार में रोती रहती थीं फिर इस क़िस्से को दर्दनाक बनाने के लिये कुछ लिखने वालों ने काफी मेहनत की और इस अंदाज़ से लिखा कि पढ़ने और सुनने वाला अपने आँसुओं पर क़ाबू ना रख सके।

खाक -ए- करबला और शहीद इब्ने शहीद नामी किताब में ये वाक़िया जिस ढंग से लिखा गया है, अगर उसे जू का तू महफिल में बयान कर दिया जाये तो लोग बिना मातम किये नहीं उठेंगे और अगर किसी मुक़र्रिर ने थोड़ा सा और नमक मिर्च लगा कर बयान किया तो अन्देशा है कि लोग अपने कपड़े चाक कर लें।
इन किताबों में सिर्फ एक यही वाक़िया नहीं बल्कि दूसरे वाक़ियात को भी इस अंदाज़ में लिखा गया है कि जिसे पढ़ कर लोग खूब रोयें।
इस तरह की किताबों और इन के लिखने वालों पर हम दूसरे मज़ामीन में तफसील से कलाम करेंगे, अब आइये देखते हैं कि हज़रते फातिमा सुगरा के इस क़िस्से की हक़ीक़त क्या है?

वाक़िया -ए- करबला पर लिखी जाने वाली मशहूर कुतुब में से एक "शहादत नवासा -ए- सैय्यदुल अबरार" है।
साहिब -ए- किताब, हज़रत अल्लामा अब्दुस्सलाम क़ादरी ने इस में एक उनवान लिखा है "वाक़िया -ए- सैय्यिदा फातिमा सुगरा बिन्ते हुसैन तहक़ीक़ की कसौटी पर" और इस उनवान के तहत लिखते हैं कि इमाम हुसैन की दो शहज़ादियों में से एक हज़रते सकीना और दूसरी हज़रते फातिमा सुगरा हैं, दूसरी शहज़ादी के मुतल्लिक़ जो क़िस्सा मशहूर किया गया है वो अरबी की मुअतबर कुतुब -ए- तवारीख वगैरा में कहीं नहीं है और उर्दू में लिखी गयी मुअतबर किताबों में भी इस की कोई अस्ल नहीं है।
अगर इस वाक़िये को तहक़ीक़ की कसौटी पर रखा जाये तो बिल्कुल बे असल है।
हज़रते फातिमा सुगरा की शादी इमाम हसन के बेटे हज़रते हसन मुसन्ना से हो चुकी थी और इमाम हुसैन की रवानगी के वक़्त आप अपने शौहर के घर में मदीना -ए- तैय्यिबा में मौजूद थीं।

(ملخصاً و ملتقطاً: شہادت نواسۂ سید الابرار، ص357)

इस मे ये तो सही है के हज़रते फातिमा सुगरा का जो किस्सा मशहूर है वो झूठ और मनघढ़त है लेकिन ये बात तहक़ीक़ की कसौटी पर खरी नही उतरती कि हज़रते फातिमा सुगरा अपने शौहर के साथ मदीना -ए- तैय्यबा में मौजूद थी। दुरुस्त तहक़ीक़ ये है कि हज़रते फातिमा सुगरा मैदान -ए- करबला में मौजूद थी और इस पर गुफ़्तगू करते हुए शैखुल हदीस, हज़रते अल्लामा मुहम्मद अली नक्शबंदी रहीमहुल्लाह लिखते है :

हज़रते फातिमा सुगरा मैदान -ए- करबला में मौजूद थी और सुन्नी व शिया, दोनों की क़ुतुब से ये साबित है। 

शिआ मुसन्निफ़ हाशिम खुरासानी ने लिखा है कि इमाम हुसैन ने अपनी शहादत के वक़्त वसीयत नामा अपनी बेटी फातिमा सुगरा को अता फरमाया।

(منتخب التواريخ، باب و فصل پنجم، ص243، مطبوعہ تہران)

एक और शिया मुहम्मद तक़ी लिसान ने लिखा है कि (जब अहले बैत का काफिला यज़ीद के पास पहुँचा तो) तो एक शामी उठा और यज़ीद की तरफ मुँह कर के कहने लगा : ए अमीरुल मुमिनीन! ये लड़की मुझे इनायत कर दो, वो फातिमा बिन्ते हुसैन को माँग रहा था।
जब सैय्यिदा फातिमा ने ये सुना तो उन पर कपकपी तारी हो गयी और अपनी फूफी सैय्यिदा ज़ैनब का का दामन थाम लिया।

(ناسخ التواریخ، ج3، ص141، مطبوعہ تہران جدید)

मशहूर शिया मुहम्मद बक़ीर मज्लिसी ने लिखा है कि यज़ीद के सामने हज़रते फातिमा सुगरा ने कहा कि ए यज़ीद! क्या रसूलुल्लाह ﷺ की बेटियाँ क़ैदी बनायी जायेंगीं? पस (ये सुन कर) लोग भी रो पड़े और घर वाले भी रो पड़े।

(بحار الانوار، ج11، ص250، مطبوعہ ایران قدیم)

अल्लामा इब्ने कसीर लिखते हैं कि जब मस्तूरात -ए- अहले बैत यज़ीद के दरबार में आयीं तो फातिमा बिन्ते हुसैन जो सकीना से बड़ी थीं, ने कहा ए यज़ीद! रसूलुल्लाह ﷺ की बेटियाँ क़ैदी?
यज़ीद कहने लगा कि ए भतीजी मैं भी इसे पसंद नहीं करता।

(البدایۃ والنھایۃ، ج8، ص196، مطبوعہ بیروت)

अल्लामा इब्ने असीर जज़री लिखते हैं कि फिर इमाम हुसैन के खानदान की औरतें अन्दर आयीं तो इमाम का सर उन के सामने था तो सैय्यिदा फातिमा और सकीना बिन्ते हुसैन आगे बढ़ने लगीं ताकि सर को देख सकें।
फातिमा बिन्ते हुसैन जो सकीना से बड़ी थीं, उन्होने कहा कि ए यज़ीद! रसूलुल्लाह ﷺ की बेटियाँ क़ैदी? कहने लगा कि ए भतीजी मैं भी इसे नापसंद समझता हूँ फिर एक शामी मर्द खड़ा हुआ और कहने लगा कि ये फातिमा मुझे दे दो।

(کامل ابن اثیر، ج4، ص85، 86، مطبوعہ بیروت)

कुतुब -ए- अहले सुन्नत वा अहले तशय्यू से साबित है कि इमाम हुसैन की बेटी हज़रते फातिमा सुगरा मैदान -ए- करबला में मौजूद थीं, ये भी साबित हो गया कि उन की तरफ मंसूब क़िस्सा बे असल है। फातिमा सुगरा के क़ासिद और खुतूत वगैरा की कोई हक़ीक़त नहीं है, ये सब जाहिल वाइज़ीन के मनघढ़त अफसाने हैं जिस का हक़ीक़त से कोई ताल्लुक़ नहीं है। लोगों को रुलाने और अपना बाज़ार चमकाने के लिये ऐसे क़िस्से कहानियों का सहारा लिया जाता है।



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