इसे भी हज़म कीजिये मैदान -ए- करबला में शादी (सिलसिला "करबला से मुतल्लिक़ कुछ झूटे वाक़ियात" से मुन्सलिक)
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*🥀 इसे भी हज़म कीजिये मैदान -ए- करबला में शादी (सिलसिला "करबला से मुतल्लिक़ कुछ झूटे वाक़ियात" से मुन्सलिक) 🥀*
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हम पहले ही बता चुके हैं कि मुल्ला हुसैन वायिज़ काश्फी सुन्नी नहीं है और उस की किताब रौज़तुश शुहदा झूटे क़िस्से कहानियों पर मुश्तमिल है।
इमाम मुस्लिम बिन अक़ील के बच्चों का वाक़िया, हज़रते अब्दुल्लाह बिन मुबारक और इमाम ज़ैनूल आबिदीन का क़िस्सा वगैरा सब झूट है लेकिन फिर भी कुछ लोग इन वाक़ियात को हज़म करना चाहते हैं तो उन्हें चाहिये कि साथ ही साथ इस क़िस्से को भी हज़म करें जिसे हम यहाँ नक़ल कर रहे हैं।
मुल्ला हुसैन वायिज़ काश्फी लिखता है कि हज़रते क़ासिम ने इमाम हसन का वसीयत नामा इमाम हुसैन को दिया, इमाम हुसैन देख कर रोने लगे फिर फरमाया कि ए क़ासिम ये तेरे अब्बा जान की वसीयत है और मैं इसे पूरा करना चाहता हूँ।
इमाम हुसैन खेमे के अंदर गये और अपने भाइयों हज़रते अब्बास और हज़रते औन को बुलाकर जनाबे क़ासिम की वालिदा से फरमाया कि मेरे भाई हसन के कपड़ों का सन्दूक़ लाओ।
सन्दूक़ पेश किया गया तो आप ने उसे खोला और उस में से इमाम हसन की ज़िरह निकाली और अपना एक क़ीमती लिबास इमाम क़ासिम को पहनाया और खूबसूरत दस्तार निकाल कर अपने हाथ से उन के सर पर बांधी और अपनी साहिबज़ादी का हाथ पकड़ कर फरमाया ए क़ासिम! ये तेरे बाप की अमानत है जिस ने तेरे लिये वसीयत की है।
इमाम हुसैन ने अपनी साहिबज़ादी का निकाह हज़रते क़ासिम से कर दिया।
इस किताब का तर्जमा करने वाले सायिम चिश्ती ने इस रिवायत के बारे में लिखा है कि अगर ये निकाह हुआ था तो इमाम हुसैन ने अपने भाई की वसीयत पर अमल किया होगा वरना इन हालात में निकाह वगैरा का मामला इंतिहायी नामुनासिब और गैर मौज़ूँ हैं।
(روضۃ الشھداء، اردو، ج2، ص297)
इस क़िस्से के बारे में इमाम -ए- अहले सुन्नत, आला हज़रत रहीमहुल्लाह से सवाल किया गया कि हज़रते क़ासिम की शादी मैदान -ए- करबला में होना जिस बिना पर मेहंदी निकाली जाती है, अहले सुन्नत के नज़दीक साबित है या नहीं?
इमाम -ए- अहले सुन्नत ने फरमाया कि ना ये शादी साबित है ना ये मेहंदी सिवा इख्तिरा इख्तिरायी के कोई चीज़ (यानी ये बनाई हुई बातें हैं।)
(انظر: فتاوی رضویہ، ج24، ص502)
हज़रत अल्लामा मुहम्मद अली नक़्श्बंदी
रहीमहुल्लाह लिखते हैं कि ये तमाम बातें मनघढ़त हैं और अहले बैत पर बोहतान -ए- अज़ीम है।
इमाम हुसैन की दो साहिबज़ादियाँ थीं और वाक़िया -ए- करबला से पहले दोनों की शादी हो चुकी थी।
(میزان الکتاب، ص246)
इस किताब में ऐसे कई झूटे क़िस्से मौजूद हैं जिन्हं हज़म करना मुमकिन नहीं है।
अगर अब भी किसी को यक़ीन नहीं है तो वो अपने हाज़मे को आज़मा सकता है।
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*🏁 MASLAKE AALA HAZRAT 🔴*
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