एक बार फिर इमाम मुस्लिम बिन अक़ील के बच्चों पर बहस (सिलसिला "करबला से मुतल्लिक़ कुछ झूटे वाक़ियात" से मुन्सलिक)

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*🥀 एक बार फिर इमाम मुस्लिम बिन अक़ील के बच्चों पर बहस (सिलसिला "करबला से मुतल्लिक़ कुछ झूटे वाक़ियात" से मुन्सलिक) 🥀*



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पिछली तहरीर में हम ने ये साबित कर दिया था कि इमाम मुस्लिम बिन अक़ील के बच्चों की शहादत का जो तवील क़िस्सा किताबों में मौजूद है वो सहीह नहीं है लेकिन फिर एतराज़ात की बौछार को देख कर हमें ज़रूरत महसूस हुई कि इस पर एक बार फिर आसान से आसान लफ्ज़ों में बहस की जाये ताकि हर एक को समझ में आ जाये।

सब से पहली बात ये है कि सुन्नी वा शिया, दोनों तरफ की कुतुब -ए- तवारीख में इमाम मुस्लिम बिन अक़ील के बच्चों का ये किस्सा मौजूद नहीं है। 
दूसरी बात जो क़ाबिल -ए- गौर है वो ये है कि दोनों तरफ की किताबों में ये लिखा है कि इमाम मुस्लिम जब कूफा की जानिब रवाना हुये तो रास्ते में प्यास की शिद्दत से आप के दो साथियों की मौत हो गयी जो आप को रास्ता बताने वाले थे 
अल कामिल, अल बिदाया, तबरी, खलदून, बिहारुल अनवार वगैरा में इमाम मुस्लिम के हालात दर्ज हैं लेकिन बच्चों का नाम तक नहीं है।
जब प्यास की शिद्दत से दो साथियों की मौत हो गयी तो बच्चों का क्या हुआ, इस का कोई तज़्किरा नहीं मिलता। जिस से मालूम होता है कि इमाम मुस्लिम का अपने बच्चों को कूफा ले जाना ही साबित नहीं है।

इस क़िस्से को सब से पहले बयान करने वाला मुल्ला हुसैन काश्फी एक ऐसा गैर मुअतबर शख्स है जिस ने कई मनघढ़त वाक़ियात को अपनी किताबों में नक़ल किया है। इस की किताब रौज़तुश शुहदा में सिर्फ यही नहीं बल्कि कई झूटे क़िस्से मौजूद हैं। इमाम मुस्लिम बिन अक़ील के बच्चों के क़िस्से को सिर्फ रौज़तुश शुहदा में होने की वजह से किसी तरह क़ुबूल नहीं किया जा सकता क्योंकि कुतुब -ए- तवारीख में इस का नामो निशान तक नहीं है बल्कि उल्टा इस की नफ़ी मौजूद है।

अब रहा ये सवाल कि जिन मुअतबर उलमा ने इसे अपनी किताबों में नक़ल किया है उन का क्या? इसे आसानी से यूँ समझें कि एक शख्स ने कोई बात कही फिर किसी दूसरे शख्स ने उस बात को आगे बयान किया फिर उस पर भरोसा कर के तीसरे शख्स ने भी आगे बढ़ा दिया फिर चौथे, पाँचवे........... इस तरह सैकड़ों लोगों ने उसे एक दूसरे पर एतिमाद कर के बयान कर दिया और वो बात काफी मशहूर हो गयी लेकिन यहाँ गौर करें कि अगर पहले शख्स की बात गलत थी तो क्या अब उन सैकड़ों लोगों के बयान करने की वजह से क़ुबूल कर की जायेगी? हरगिज़ नहीं क्योंकि उन सैकड़ों के सहीह या गलत होने का दारोमदार उस पहले शख्स पर है लिहाज़ा अगर पहला सहीह है तो सैकड़ों लोग भी सहीह क़रार दिये जायेंगे और अगर पहला गलत है तो वो बात गलत ही रहेगी। इसी तरह इमाम मुस्लिम बिन अक़ील के बच्चों के क़िस्से को सबसे पहले लिखने वाला शख्स ही झूटा है तो फिर बात खत्म हो जाती है।

शियों में से बाज़ ने भी ये बात तस्लीम की है कि कुतुब -ए- तवारीख में इस किस्से का कोई ज़िक्र नहीं मिलता और अगर चंद किताबों में है भी तो ये है कि इमाम हुसैन की शहादत के बाद इमाम मुस्लिम के छोटे बेटे क़ैद में थे। शियों ने ये भी लिखा है कि सब से पहले इसे बयान करने वाला मुल्ला हुसैन काश्फी है और झूटे क़िस्से कहानियों को बयान करना इस का मनपसंद तरीक़ा है।

इस क़िस्से को सहीह कहने का मतलब है कई झूटे क़िस्से को क़बूल करने का दरवाज़ा खोलना क्योंकि रौज़तुश शुहदा में और भी कई अफसाने मौजूद हैं जिन की तफसील हमारे एक दूसरे क़िस्तवार मज़मून "इसे भी हज़म कीजिये" में मौजूद है, वहाँ मुलाहिज़ा फरमायें।



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