कुछ पानी बंद होने के बारे में (सिलसिला "करबला से मुताल्लिक़ कुछ झूटे वाक़ियात" से मुन्सलिक)
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*🥀 कुछ पानी बंद होने के बारे में (सिलसिला "करबला से मुताल्लिक़ कुछ झूटे वाक़ियात" से मुन्सलिक) 🥀*
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मैदान -ए- करबला में अहले बैत पर पानी बंद किया गया या नहीं? इस पर दोनों तरह की रिवायात मौजूद है लेकिन बयान सिर्फ उन्हीं को किया जाता है जिस से लोगों को रुलाया जा सके।
कहा जाता है कि तीन दिन तक अहले बैत के खेमें में एक बूँद भी पानी नहीं था और मुसलसल तीन दिन तक बच्चो से ले कर बड़ों तक सब प्यासे रहे और कुछ मुक़र्रिरीन इस से भी आगे बढ़ जाते है और पाँच मुहर्रम से ही पानी बंद कर देते है ताकि वाक़िया मज़ीद दर्दनाक हो जाये।
तारीख इब्ने कसीर में एक रिवायत कुछ यूँ है कि दसवीं मुहर्रम को इमाम हुसैन रदिअल्लाहु त'आला अन्हु ने ग़ुस्ल फ़रमाया और खुशबू लगाई और बाज़ दूसरे साथियो ने भी ग़ुस्ल फरमाया।
(البداية والنهاية، ج8، ص185)
इस रिवायत को मुक़रर्रिन हाथ भी नही लगाते क्योंकि अगर इसे बयान कर दिया तो फिर लोगों को रुलाने का धंधा चौपट हो जाएगा, फिर किस मुँह से कहा जायेगा कि तीन दिन तक अहले बैत के खेमो में एक बूँद भी पानी नहीं था।
ख़लीफ़ा -ए- हुज़ूर मुफ्ती -ए- आज़म -ए- हिन्द, शारेह बुखारी, हज़रते अल्लामा मुफ़्ती शरीफुल हक़ अमजदी रहीमहुल्लाह से सवाल किया गया कि क्या इमाम हुसैन ने आशूरा की सुबह ग़ुस्ल फ़रमाया था? क्या ये रिवायत सही है? अगर सही है तो फिर खुद उलमा -ए- अहले सुन्नत जो बयान करते है के तीन दिन तक हज़रते इमाम हुसैन और उन के रूफक़ा पर पानी बंद किया गया, यहां तक कि बच्चे प्यास से बिलकते रहे।
आप रहीमहुल्लाह जवाबन लिखते है कि ये रिवायत तारीख की किताबो में मौजूद है, मसलन बिदाया निहाया में है :
فعدل الحسین الی خیمة قد نصبت فاغتسل فیھا وانطلی بانورۃ... الخ
"उस के बाद इमाम हुसैन खेमे में गये और उस मे जा कर ग़ुस्ल फ़रमाया और हड़ताल इस्तिमाल फरमायी और बहुत ज़्यादा मुश्क जिस्म पर मली, उनके बाद बाज़ रूफक़ा भी खेमे में गये और उन्होने भी ऐसा ही किया।"
(البداية والنهاية، جلد ثامن، ص178)
और इसी में एक सफहा पहले ये भी है :
وخرت مغشیا علیھا فقام الیھا وصب علی وجھھا الماء
"हज़रते ज़ैनब बेहोश हो कर गिर पड़ीं, हज़रते इमाम हुसैन उन के क़रीब गये और उन के चेहरे पर पानी छिड़का।"
(ایضاً، ص177)
शारहे बुखारी रहीमहुल्लाह मज़ीद लिखते है की ये दूसरी रिवायत तबरी में भी है हत्ता कि राफ़ज़ियों की भी बाज़ किताबो में (मौजूद) है।
हमारे यहां शियों ने भी एक दफा नुक़्क़न मियाँ को बुलाया था जो मुजतहिद भी थे और बहुत पाये के खतीब भी, उन्होंने ये रिवायत अपनी तक़रीर में बयान की जिस पर जाहिलो ने बहुत शोर मचाया, उन को गालियाँ दीं, एक जाहिल ने तो यहाँ तक कह दिया कि अगर ऐसे दो एक वाइज़ (मुक़र्रिर) आ गए तो हमारा मज़हब..........में मिल जाएगा (खाली जगह में गालिबन कोई गाली होगी)
(फिर दोनो तरह की रिवायत के मुताल्लिक़ लिखते है कि) ये सहीह है के 7 मुहर्रम से इब्ने ज़ियाद के हुक़्म से नहरे फुरात पर पहेरा बैठा दिया गया था कि हज़रते इमाम आली मकाम के लोग पानी ना ले पायें मगर ये भी रिवायत है कि इस पहरे के बावजूद हज़रते अब्बास कुछ लोगों को लेकर किसी ना किसी तरह से पानी लाया करते थे लेकिन शहादत के ज़ाकिरीन (हमारे मुक़र्रिरीन) आब बन्दी (यानी पानी बन्द होने) की रिवायत को जिस तरह बयान करते हैं अगर ना बयान करें तो महफिल का रंग नहीं जमेगा।
इस रिवायत में और वक़्ते शहादत हज़रते अली अकबर व हज़रते अली अशगर का प्यास से जो हाल मज़कूर है मुनाफात (तज़ाद) नहीं।
हो सकता है कि सुबह को पानी इस मिक़्दार में रहा हो कि सब ने गुस्ल कर लिया फिर पानी खत्म हो गया और जंग शुरू हो जाने की वजह से फुरात के पहरे दारों ने ज़्यादा सख्ती कर दी हो, इस की तायीद इस से भी हो रही है कि हज़रते अब्बास फुरात से मश्क भर कर पानी ला रहे थे कि शहीद हुये।
हमें इस पर इसरार नहीं कि ये रिवायत सहीह है मगर मैं क़तई हुक्म भी नहीं से सकता कि ये रिवायत गलत है। तारीखी वाक़ियात जज़बात से नहीं जाँचे जाते, हक़ाइक़ और रिवायात की बुनियाद पर जाँचे जाते हैं।
(فتاوی شارح بخاری، ج2، ص68،69)
पानी बन्द होने वाली सिर्फ एक तरफ की रिवायत को बयान करना और ये कहना कि तीन दिन तक अहले बैत के खेमों में एक बूँद पानी नहीं था, इस से वाज़ेह है कि मक़सद सिर्फ लोगों को रुलाना और महफिल में रंग जमाना है।
अपने मतलब की रिवायात में नमक मिर्च लगा कर बयान करना और दूसरी रिवायात को हड़प जाना, ये कहाँ का इन्साफ है? अब रहा ये सवाल कि हमें क्या समझना चाहिये तो इस का जवाब आप पढ़ चुके हैं।
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*🏁 MASLAKE AALA HAZRAT 🔴*
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