कूफियों की बद-अख्लाकी19

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     *🥀 दास्तानें करबला 🥀* 



           ❗️ *पोस्ट- 19* ❗️

*!! कूफियों___की बद-अख्लाकी___!!*

*और करबला___का___मैदान   *

🐪     हज़रत इमाम हुसैन रदीअल्लाहु त आला अन्हु को रास्ते ही में हज़रत मुस्लिम और उनके बच्चों के शहीद हो जाने की खबर मील जाने के बावजूद, आप ने सफर जारी रखा। 

🤺     आपके मक्का से रवानगी की खबर पाकर इब्ने जियाद ने *हुर्र बिन रूबाही को एक हजार का लश्कर देकर हजरत इमाम को घेरकर कुफा लाने के वास्ते भेज दिया।*

🤺     जब कूफ़ा दो मंजिल की दूरी पर रह गया तब आपको हुर्र बिन रूबाही मिला, *हुर्र के साथ 1000 हथियार बन्द सुवार थे।* हजरत इमाम हुसैन ने जब लश्कर को देखा तो एक शख्स को मालुम करने के लिये भेजा की यह  कैसा लश्कर  है, इतने में हुर्र इब्ने रूबाही खुद हजरत इमाम के सामने आया और कहने लगा कि, *मुझे इब्ने जियाद ने आपको घेर कर उसके पास ले जाने के लिये भेजा है।*

🤺     हजरत इमाम हुसैन रदीअल्लाहु त आला अन्हु ने इस लश्कर मे खुत्बा पढ़कर सुनाया की: 

           *"ऐ लोगो ❗️ मेरा इरादा इधर आने का न था, मगर पै दर पै तुम्हारा खत पहुंचा, कासीद आए  की जल्दी तशरीफ लाओ, इसलिए  मैं आया हूं।"*

▪️   हुर्र बोले की खुदा की कसम!  मै उन खुतुत से खबरदार नही हुं।

▪️   *हजरत इमाम हुसैन ने फरमाया :*

       *'मगर तुम्हारे इसी लश्कर में बहुत से ऐसे आदमी मौजुद है, जिन्होंने मुझे खत लिखे फिर आपने खुतुत पढ़कर सुनाये, अकसर ने सिर निचा किया और कोई जवाब न दिया।*

▪️   हुर्र ने हजरत इमाम से कहा की : "हजरत ❗️  इब्जे ज्याद ने मुझे हुक्म दिया है कि आपको घेरकर उसके पास ले आऊं। मगर मेरे हाथ कट जाये जो आप पर तलवार उठाऊं। 
        ‘लेकिन मुखालीफ मेरे साथ है, इसलिए मसलेहत यही है कि मैं आपके साथ रहुं। रात को आप मसतुरात (औरतों) का बहाना करके मुझसे अलग हो जाना और जब लश्कर वाले सो जाये तो आप जिस तरफ चाहे चले जायें। मैं सूबह को कुछ देर जंगल मे तलाश करके वापस चला जाऊंगा और इब्ने ज्याद से कुछ बहाना कर दुगा...!!‘

 *_📚सिर्रूश्शहादतैन, सफा-19, तजकीरा, सफा-19, )_* 
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🤺     हज़रत इमाम हुसैन रदीअल्लाहु तआला अन्हु और उनके काफ़िले को एक हजार के लश्कर ने घेर लिया। *ना ही उन्हें शहर के अंदर दाखिल होने दिया जा रहा था, ना ही वोह वापस अपने वतन जा सकते थे।* बिल आखिर आप कुफा की राह से हट गए, और आपको काफिले समेत करबला में नुजुल फरमाना पड़ा। 

🗓     *ये सन 61 हिजरी मुहर्रम की दूसरी तारीख थी।* आप ने इस मकाम का नाम दरयाफ्त किया तो मालूम हुवा कि, *इस जगह को करबला कहते हैं। इमाम हुसैन करबला से वाकिफ थे, और आपको मालूम हुआ कि करबला ही वोह जगह है जहां अहले बैत रिसालत को राहे हक में अपने खून की नदियां बहानी होगी।* 

✨     आप को इन दिनों *हुज़ूर सय्यदे आलम सल्लललाहो अलैहि वसल्लम* की ज्यारत नसीब हुई, और आपको शहादत की खबर दी और आपके सीनए मुबारक पर दस्ते अकदस रख कर दुआएं फरमाई।

⛺️     अजीब वक़्त है कि जिनको महेमान बनाकर बुलाया गया था, *उन्हें इस तरह बे सरो सामान खुले मैदान में तपती हुई रेत पर तेज धूप में औरतों और बच्चों समेत अपना पड़ाव डालने पर मजबूर किया जा रहा है।* और इन मुसाफिरों के सामने हज़ार का लश्कर उन्हें अपनी तलवार और नेजो की कुव्वत दिखा रहा है।

📜     अभी इतमीनान से बैठने और थकान दूर करने की सूरत भी नजर न आयी थी कि *इमामे हुसैन की खिदमत में इब्ने जियाद का खत पहुंचा जिसमें उस ने हज़रत इमाम हुसैन से यजीद पलीद की बैत तलब की थी। आपने वोह खत पढ़ कर डाल दिया और कासिद से बैत कर ने से इनकार कर दिया।*

(📚 *सवानाहे करबला सफा 131)*

*⌛ ( बाकी अगली पोस्ट में इंशा अल्लाह )*



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