शहादत__ए__अली अकबर 27
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*🥀 दास्तानें करबला 🥀*
❗️ *पोस्ट- 27* ❗️
💔 *!! शहादत__ए__अली अकबर !!*
🤺 जब *हज़रते अली अकबर* ने मुलाहजा फ़रमाया की दुश्मनों में से कोई एक भी आगे नही बढ़ता.... तो आप ने दुश्मन के लश्कर पर हमला किया, एक-एक वार में कई लोगो को मार गिराया। *हर तरफ शोर बरपा हो गया, दिलावरो के दिल छूट गए, बहादुरो की हिम्मते टूट गई, शाहज़ादए अहले बैत का हमला न था, अज़ाबे इलाही की बलाए अज़ीम थी।*
🤺 धूप में जंग करते करते प्यास का गल्बा हुआ। जंगे मैदान से आप अपने वालिद माजिद की खिदमत में हाज़िर हुए और अर्ज़ किया : *"बाबा जान! प्यास का बहुत गल्बा है" !* अगर इस वक़्त हल्क़ तर करने के लिये चन्द क़तरे मिल जाए तो फातीमी शेर, ये तमाम लश्कर को खाक कर डाले ।"
इमामे हुसैन (र अ) ने अपनी अंगूठी अपने बेटे के दहाने अक़दस में रख दी। वालिद की शफ़क़त से फिल जुमला तसकीन हुई फिर सहजादे ने मैदान का रुख किया फिर सदा दी :
*"कोई जान पर खेलने वाला हो तो सामने आए..."*
🤺 अम्र बिन साद ने तारिक़ से कहा : *"बड़े शर्म की बात है की, अहले बैत का एक अकेला नौ जवान मैदान में है* और तुम हज़ारो की तादाद में हो। वोह भूका है, प्यासा है.... और तुम्हारी ताज़ा दम जमाअत..... इन में से किसी को मुक़ाबले की हिम्मत नही। कुछ गैरत हो तो मैदान में पहुच कर मुक़ाबला करके फ़त्ह हासिल करो....*तो मैं वादा करता हुं कि, इब्ने ज़ियाद से तुझको मौसिल की हुकूमत दिला दूंगा।*
🤺 इस पर हरिस तारिक़ मौसिल की हुकूमत की लालच में फरज़न्दे रसूल से मुक़ाबले के लिये चला, सामने पहुचते ही शाहज़ादए वाला पर नेज़े का वार किया। आप ने उस का नेज़ा रद्द फरमा कर सीने पर एक ऐसा नेज़ा मारा की, *तारिक़ की पीठ से निकल गया और वो एक दम घोड़े से गिर गया। शहज़ादा ने घोड़े से उस को रौंद डाला और हड्डिया चकना चूर कर दी। ये देख कर तारिक़ के बेटे अम्र बिन तारिक़ को तैश आया* और वो झल्लाता हुवा घोडा दौड़ा कर हज़रते अली अकबर पर हमला आवर हुवा आप ने एक ही नेज़े में उसका काम भी तमाम किया।
.........इसके बाद *उसका भाई तल्हा बिन तारिक़* अपने बाप और भाई का बदला लेने के लिये आतिशी शोले की तरह हज़रते अली अकबर पर दौड़ पड़ा। आप ने उसके गिरेबान में हाथ डाल कर ज़ीन से उठा लिया और ज़मीन पर इस ज़ोर से पटका की उस का दम निकल गया, *आप की हैबत से लश्कर में शोर बरपा हो गया।*
🤺 अब किसी में हिम्मत न रही थी की *तन्हा* इस शेर के मुक़ाबिल आता। इब्ने साद ने महकम बिन तुफैल और इब्ने नौफिल को *एक-एक हज़ार सुवारो के साथ (यानी कुल दो हजार का लश्कर), आप पर एक साथ हमला करने के लिये भेजा।*
..........आप ने नेज़ा उठा कर उन पर हमला किया और उन्हें धकेल कर कल्बे लश्कर तक भगा दिया। *इस हमले में आप के हाथ से कितने बद नसीब हलाक हुए, कितने पीछे हटे।*
🤺 आप पर प्यास की शिद्दत बहुत हुई, फिर आप ने घोड़े दौड़ा कर अपने वालिद की खिदमत में हाज़िर हो कर अर्ज़ किया : *बाबा ! प्यास की बहुत शिद्दत है।* इस मर्तबा हज़रते इमाम हुसैन ने फ़रमाया: ऐ नुरे दीदा ! होज़े कौषर से सैराबि का वक़्त क़रीब आ गया है, दस्ते मुस्तफा (स अ व) से वो जाम मिलेगा जिस की लज़्ज़त न तसव्वुर में आ सकती है... न ज़बान बयान कर सकती है।"
🤺 *ये सुन कर हज़रते अली अकबर को ख़ुशी हुई और वो फिर मैदान की तरफ लौट गए।* और लश्करे दुश्मन के यमीन व यसयार पर हमला करने लगे, इस मर्तबा लश्कर ने एक साथ चारो तरफ से घेर कर आप पर हमला कर दिया। आप भी हमला फरमाते रहे और दुश्मन हलाक होते रहे, लेकिन हर तरफ से नेज़ो के ज़ख्मो ने बदन को चकना चूर कर दिया था और *उनका तन अपने खून में नहा गया था, इस हालत में आप घोड़े की पुश्त से रुए ज़मीन पर आए।*
🤺 उस वक़्त आप ने आवाज़ दी : *"ऐ बाबा जान ! मुझ को लीजिये"।*
..........हज़रते इमाम हुसैन घोडा बढ़ा कर मैदान में पहुचे और आप को ख़ैमे में लाए, हज़रते अली अकबर ने आँख खोली और अपना सर वालिद की गोद में देख कर फ़रमाया : *"मैं देख रहा हु आसमान के दरवाज़े खुले हुए है बहिश्ती हूरें शर्बत के जाम लिये इन्तिज़ार कर रही है।"*
*इतना केह कर, आप इस फानी दुनिया से रुखसत हुवे।*
*(📚 सवनाहे करबला सफा 157)*
*⌛ ( बाकी अगली पोस्ट में इंशा अल्लाह )*
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