इमामे हुसैन की शहादत के बाद के वाक़िआत* 33

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     *🥀 दास्तानें करबला 🥀* 



           ❗️ *पोस्ट- 33* ❗️

  ⚔️ *इमामे हुसैन की शहादत के बाद के वाक़िआत*  ⚔️

✨ *रब की नाराजगी की चंद निशानियां* ✨

🖊     *आसमान में लोहे की कलम का नमूदार होना*

✨     अबू नूएम ने बतरीके इब्ने लहिया अबी कबील से रिवायत की है कि:
         
          " हज़रत इमाम हुसैन की शहादत के बा‘द जब बदनसीब कूफी आप के सरे मुबारक को लेकर चले.... और पहेली मंजील में एक पड़ाव पर बैठ कर शरबत और खुर्मा पीने लगे, तो उस वक़्त एक लोहे का कलम नमूदार हुवा, *जिसने आसमान पर खून से शे’ र लिखा :*

        *”अतर्जु उम्मतु कत्लत हुसयना”*
       *”शफाअत जद्दिही यवमल हिसाबी”*

(*तर्जुमा:*  
          “क्या वोह तबका जिसने हुसैन को शहीद कर दिया है”.... 
          “क़ियामत के दिन उसके नाना की शफाअत की उम्मीद रखता है ??” )

🟤     *दिरहम का पत्थर बन जाना*

✨     एक और मंज़िल में इस काफिले ने क़याम किया, वंहा एक दैरासर था । दैरासर के राहिब (पादरी) ने उन लोगो को, *80000 दिरहम* दे कर.... इमामे हुसैन का सरे मुबारक को एक रात अपने पास रखा। 

          गुस्ल दिया इत्र लगाया, अदब व ताज़ीम के साथ पूरी रात ज़ियारत करता रहा और रोता रहा और रहमते इलाही के जो अनवार सरे मुबारक पर नाज़िल हो रहे थे उन का देखता रहा....हत्ता की ये उस के इस्लाम कुबूल करने का सबब हुवा। 

         .........अश्किया ने जब दिरहम तक़सीम करने के लिये थैलियों को खोला, *तो देखा सब में पैसो की जगह पत्थर की ठीकरियां भरी हुई है.... और उन के एक तरफ लिखा है:*

         *और हरगिज़ अल्लाह को बे खबर न जानना जालिमो के काम से* 

(📖 सूरए इब्राहीम) 

.....और दुआरी तरफ लिखा था: 

          *और अब जाना चाहते है ज़ालिम, कि किसी करवट पलटा खाएगे*  

(📖 सूरए अल शुअरा)

💔    *इमाम हुसैन के सर मुबारक का कलाम करना*

✨     इब्ने असाकिर ने मिन्हाल बिन अम्र से रिवायत की वो कहते है : 

          “वल्लाह ! मैं ने अपनी आंखो से खुद देखा की, जब इमामे हुसैन के सर मुबारक को लोग नेज़े पर लिये जा रहे थे.... उस वक़्त मैं दमिश्क़ में था, सर मुबारक के सामने एक शख्स सूरए कहफ़ पढ़ रहा था, *जब वो इस आयत पर पहुचा:*

*तर्जुमा:  “असहाबे कहफ़ व रक़ीम हमारी निशानियों में से अजब थे”*

(📖 सूरए अल कहफ़ )

     *उस वक़्त अल्लाह ने आप के सरे मुबारक को गोयाई दी*, तो आपके सरे मुबारक ने फ़रमाया : 

*असहाबे कहफ़ के वाक़ीए से मेरा क़त्ल और मेरे सर को लिये फिरना अजीब तर है*
*📚 सवानहे कर्बला, 176*

*⌛ ( बाकी अगली पोस्ट में इंशा अल्लाह )*



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